कई बार सफ़र का संयोग अचानक ही बन जाता है. यात्राओं की योजनायें बनानी नहीं पड़ती, बल्कि ये किस्मत से हमें मिलती हैं और फिर रह जाती है हमारी यादों में ताउम्र यादगार बन कर. पटना से बनारस का ये सफ़र भी कुछ ऐसा ही था. जब तक दैनिक जागरण, पटना में रहा, तो न जाने कितनी दफा भाऊ (राघवेन्द्र दुबे सर) से इस शहर की तारीफें सुनी. अच्छा लगता था जब वो हमलोगों को बनारस की हर छोटी बड़ी विशेषताएं बताया करते थे. कहते थे कि बड़ा अद्भुत शहर है बनारस. जहां एक शहर में पूरा हिंदुस्तान बसता है. एक बार जब वो इस शहर की बातें बतानी शुरू करते तो फिर ऐसा लगता जैसे हमलोग खुद बनारस पहुँच गए हों.

बनारस के बारे में बताते थे कि इस शहर में शोक नहीं उल्लास है. जन्म से लेकर मृत्यु तक यहां काशी में संगीत बजता है. बनारस की मौज मस्ती को किसी खास दायरे में नहीं बाँधा जा सकता, बल्कि बनारसी प्रतिकूल परिस्थितियों में भी सामान्य रहते हैं और इसका उदाहरण देते हुए वो कहते थे की दुनिया में कहीं भी अगर जाम लगता है, जैसे पटना के डाक बंगला चौराहे पर जाम लग जाए, दिल्ली के कनाट प्लेस में या मुम्बई के परेर में जाम लग जाए तो लोग उस जाम से चिढ़ते हैं. गुस्सा करते हैं. जाम के दौरान बिना मतलब बीस बार हॉर्न बजायेंगे, अगल बगल वाले से झगड़ा करेंगे, लेकिन बनारसी इसी जाम को एन्जॉय करता है. जैसे अब जाम लग गया तो लग गया. ऐसे में भी लोगों को एक दुसरे से बतियाने का मौका मिल जाता है. का हो गुरु, बड़ा लम्बा जाम लग गेलो…. अरे त ठीके है यार, आउ बतावह का हाल ह….. ऐसे न जाने कितने प्रसंग वो अपने चिरपरिचित बनारसी लफ्जों में हमें सुनाते थे, और हमलोग भी बड़े मजे ले लेकर उन्हें सुनते थे. बाद में जब दर्श न्यूज़ में आया तो यहां भी विवेक चंद्रा सर की बनारसी ख्वाहिशें कई दफा सुनने को मिली. बनारस की गाथाएं सुनते सुनते मन में इस शहर के प्रति एक उत्सुकता जागने लगी.

शहर को देखने, जानने, समझने की ललक पैदा हुई और इसी चाहत को दिल में लिए एक दिन पहुँच गया पटना से बनारस. यानी वो शहर जो सुबह साधु-संतो के मंत्रोच्चारण सुनकर जगता है तो रात में गंगा आरती का संगीत सुन कर सोता है. विश्व का सबसे पुराना शहर और बाबा विश्वनाथ की नगरी कहलाने वाले बनारस की ऐसी ही कई खासियत है. संत–सन्यासियों के लिए यह काशी है, तो आम लोगों के लिए बनारस, वहीँ आधिकारिक तौर पर इसे वाराणसी ही कहा जाता है. 7 पवित्र शहरों, 52 शक्ति पीठों और 12 ज्योतिलिंगों में से एक इस शहर में अजीब आकर्षण, एक अलग अहसास है जो लोगों को अपनी ओर खिचता है.

बनारस में हमारा प्रवास आठ दिनों तक का रहा और इस दौरान यहां रहने वाले हमारे रिलेटिव गगन जी और ऑन डिमांड फोटोग्राफर रोहित जी की बदौलत हर दिन हमने इस शहर को अलग तरीके से देखा, पहचाना. कभी बनारस की पुरानी संकरी गलियों से गुजरा तो कभी बनारस के जायके को चखा. बनारस का वो एक एक दिन एक हमारे लिए खास रहा. सुबह गंगा के घाटों पर उगते सूर्य की सुन्दरता तो शाम में डूबते सूर्य के उस अद्वितीय नजारे के साथ गंगा आरती सुनना मन को बड़ा आनंदित कर देता.

आखिर क्यों कहते हैं बनारस को घाटों का शहर

बनारस यूँ ही घाटों का शहर नहीं कहलाता, यहां अलग अलग नामों के करीब 84 घाट है. सभी बिलकुल धनुषाकार रूप में श्रृंखलाबद्ध तरीके से स्थित हैं. इनमे कई घाट अपने धार्मिक और आध्यात्मिक महत्त्व से जाने जाते हैं तो कई अपनी प्राचीनता और समृद्ध इतिहास को लेकर अलग खासियत रखते हैं. ये घाट अपनी निराली छटा के लिए भी खूब प्रसिद्ध है. इसलिए बनारस के जिस घाट पर भी हमलोग जाते, वहां की खूबसूरती को अपने कैमरे में कैद करने की कोशिश में लग जाते, काशी के घाटों में दशाश्वमेघ घाट का प्रमुख स्थान है. यह घाट गोदौलिया के पास ही है, पुराणों के अनुसार यहां पर ब्रह्मा जी ने दस अश्वमेघ यज्ञ किया था. इस स्थल को ब्रह्म द्वार भी कहा जाता है.इसका प्राचीन नाम रुद सरोवर है. गंगा के आगमन के साथ रुद सरोवर ही गंगा में विलीन हो गया. यहां के वर्तमान घाट का निर्माण 1748 में बाला जी बाजीराव पेशवा द्वारा करवाया गया. यहां हर रोज शाम में होने वाली गंगा आरती को देखने देश विदेश के लोग आते है. शाम में इस आरती में शरीक होने का मौका हम लोगों को भी मिला. गंगा आरती में शामिल होने वालों की जितनी भीड़ घाटों पर थी ठीक उतनी ही घाटों के सामने गंगा में नावों पर भी नजर आई. हमलोगों ने भी घाट के ठीक सामने एक नाव पर बैठ कर इस आरती का आनंद लिया. वैसे अपने यहां पटना में भी काली घाट पर ऐसी आरती होती है  लेकिन यहां की बात कुछ और थी. जीवनदायिनी गंगा की लहरें और उन लहरों में डोलती हमारी नाव, उस पर घाटों पर लगे हाई मास्ट लाइटों की पानी में पड़ रही परछाई देख बड़ा अच्छा लगा. बिलकुल आध्यात्मिक स्तर पर मन को शुद्ध और शांत करने वाला अनुभव था यह.

इसी घाट के ठीक बगल में राजेंद्र घाट है. इस घाट को देश के प्रथम राष्ट्रपति डॉ राजेंद्र प्रसाद की स्मृति में बनाया गया है. यहां पर भी हमलोगों ने जी भर के मस्ती की. सिर्फ एक दिन नहीं बल्कि दो-तीन दिन लगातार हमलोगों ने सुबह गंगा स्नान किया. बनारस की सुन्दरता देखनी हो तो गंगा घाट पर सुबह आइये. एक ओर उगते सूर्य की किरणों से खेलती गंगा की लहरें बिलकुल सोने सी सुनहरी दिखती है. तो वहीँ दूसरी ओर हवाओं में तैरते धूप-अगरबत्तियों की खुशबु, मन्त्रों-श्लोकों का जाप आत्मा को झंकृत कर देता है और इन सबके बीच गंगा में लगायी डुबकी एक नया जीवन दे जाती है. गंगा की तेज लहरों में अपने शरीर को बिलकुल शांत छोड़ देने पर ऐसा महसूस होता मानों गंगा मैया हमें अपनी गोद में थपकियाँ देकर झुला रही हो. दूसरे दिन हमलोग अस्सी घाट पर भी गये. लेकिन वहां की चर्चा अगले पोस्ट में करेंगे.

मंदिरों की नगरी भी कहलाता है बनारस

महादेव की इस नगरी में आपको गली-गली, चौराहे-चौराहे खूब मंदिर मिलेंगे. यहां का हर मंदिर अपनी अलग कहानी और विशेषताओं से जाना जाता है. तभी तो अमेरिकी राइटर मार्क ट्वेन लिखते हैं कि बनारस में मंदिरों की संख्या इतनी है कि उसकी गणना नही की जा सकती. यहां तक कि गंगा स्वयं में एक मंदिर है.

12 ज्योतिर्लिंगों में से एक यहां का काशी विश्वनाथ मंदिर देश विदेश में प्रसिद्ध तो है ही, इसके अलावे दुर्गा मंदिर, तुलसी मानस मंदिर, भारत माता मंदिर, संकट मोचन मंदिर, त्रिदेव मंदिर, माता अन्नपूर्णा का मंदिर, शीतला मंदिर और बीएचयू परिसर में बना नया विश्वनाथ मंदिर भी दर्शनीय है. बनारस आयें तो इन मंदिरों के दर्शन भी जरुर करें.

गोल्डन टेम्पल कहलाता है विश्वनाथ मंदिर

दशाश्वमेघ घाट से बाहर निकलते ही दाहिनी ओर एक संकरे गली में कुछ क़दमों के फासले पर है बाबा विश्वनाथ का मंदिर. जहां तंग गलियों से गुजरते हुए अब हम आगे बढ़ रहे थे. गली के दोनों तरफ फूल-माला और प्रसाद की दुकानें थी. कुछ कुछ दूरी पर यूपी पुलिस भी दिख रही थी. मंदिर के अन्दर मोबाइल, कैमरा, बैग ले जाने पर प्रतिबन्ध था. इसलिए जिस दुकान से हमलोगों ने प्रसाद ख़रीदा, वहीँ एक लॉकर में सब कुछ रख दिया. आश्चर्य लगा देश के अन्य मंदिरों में सामान जमा करने की व्यवस्था मंदिर प्रबंधन की होती है वही यहां आने वाले दर्शनार्थियों को इसके लिए स्थानीय दुकानवालों पर निर्भर रहना पड़ता है. दुकानदार अपनी दुकानों में अलग अलग खानों वाली लोहे की एक आलमीरा रखते हैं और इसी में एक खाने में आप अपने सामान रख कर लॉक कर दीजिये और चाभी अपने पास रखिये. हालाँकि वे इसके लिए कुछ चार्ज नहीं करते, बस बाध्यता यह है कि आपको उनकी दुकानों से प्रसाद लेनी होगी. यहां छोटे बड़े गिलासों में भगवान शिव पर चढ़ाने के लिए भांग मिश्रित दूध मिल रहा था. मुझे छोड़ सबने महादेव को खुश करने के लिए एक एक गिलास वो भी ले लिया. अब हमलोग मंदिर के गेट नंबर 2 की ओर सुरक्षा जांच प्रक्रिया से होकर लम्बी कतार में खड़े थे. इस दौरान लोगों की भीड़ देख ऐसा लग रहा था मानों यह मंदिर नहीं बल्कि सचमुच एक लघु भारत हो. जहां देश के अलग अलग राज्यों से आये लोग थे, उनकी अलग अलग भाषाएँ थी, ईश्वर भक्ति की अलग अलग विधाएं थी, पर इन सबके बीच एक थी तो आस्था, अपने आराध्य के प्रति विश्वास. बाबा विश्वनाथ के चौखट पर हर किसी का झुकता सर इसकी गवाही दे रहा था. धीरे धीरे हम लोग भी मंदिर के अन्दर दाखिल हुए. मन ही मन काशी विश्वनाथ को धन्यवाद दिया क्योंकि कुछ ही लम्हों बाद उनके दर्शन का सौभाग्य जो मिलने वाला था.

काशी विश्वनाथ का यह मंदिर मध्ययुगीन काल में नष्ट हो गया था, लेकिन बाद में फिर इसे साल 1776 में बनाया गया. कहा जाता है कि महादेव ने इंदौर की महारानी अहिल्या बाई होलकर को सपने में दर्शन देकर इस मंदिर की स्थापना करने को कहा था. पंजाब के महाराजा रणजीत सिंह ने 9 क्विंटल सोना इस मंदिर को दान दिया था, जिससे मंदिर के शिखर को सोने से मढ़वाया गया.

काशी विश्वनाथ मंदिर का परिसर ज्यादा बड़ा नहीं है, अन्दर देखा एक जगह कई छोटे छोटे शिव लिंग स्थापित थे. कतार में लग कर अब बाबा विश्वनाथ के मुख्य मंदिर की और बढ़ रहे थे. अपने आराध्य के दर्शन के लिए यहां लोगों की भीड़ लगी थी. नजदीक पहुंचा तो देखा अन्दर फर्श पर चांदी  की वेदी में काले पत्थर से बना 60 सेंटीमीटर ऊँचा शिवलिंग स्थापित है. जिस पर फूल मालाएं अर्पित है. ऊपर से गंगा जल की टपकती बूंदें…. मैं तो भक्ति भाव से बस उन्हें देखता रह गया. मेरे अगल बगल और लोगों में इस शिवलिंग को स्पर्श करने की होड़ लगी थी. कोई उनपर दूध चढ़ा रहा था तो कोई गंगाजल से उन्हें स्नान करा रहा था, भोलेनाथ के सभी भक्त अपने प्रभु के ऊपर फूल-मालाएं, बेल पत्र अर्पण करने में लगे थे, लेकिन मैं तो खाली हाथ आया था उनके दर पर, मैं क्या दे सकता हूं भोलेनाथ को. सोचने लगा वाकई आखिर मैं कौन होता हूं महादेव को कुछ देने वाला. मैं तो खुद याचक बन कर आपके पास आया हूं. बस उन्हें करबद्ध नमन कर बाहर निकल गया.

इस मंदिर में बाबा विश्वनाथ की पांच मुख्य आरतियाँ होती है. प्रतिदिन सुबह 2:30 बजे इस मंदिर के किवाड़ खुलते है. जिसके बाद 3 बजे से 4 बजे तक मंगल आरती होती है. दर्शनार्थी इस आरती में टिकट लेकर शामिल हो सकते हैं. इसके बाद 4 बजे से सुबह 11 बजे तक इसे सबके लिए खोल दिया जाता है. फिर 11:30 बजे से दोपहर 12 बजे तक भोग आरती का आयोजन होता है. 12 बजे से शाम 7 बजे तक पुनः इस मंदिर में सार्वजनिक दर्शन की व्यवस्था है. शाम 7 बजे सप्तऋषि आरती होती है. रात 9 बजे तक सभी दर्शनार्थी मंदिर के भीतर दर्शन कर सकते हैं. उसके बाद 9 बजे श्रृंगार या भोज आरती होती है. और अंत में रात 10:30 बजे शयन आरती प्रारंभ होती है जो 11 बजे ख़त्म हो जाती है.

हनुमान जी को समर्पित संकट मोचन मंदिर

संकट मोचन मंदिर

संकट मोचन मंदिर बजरंगबली के पवित्र मंदिरों में से एक है. मान्यता है कि यहां हनुमान जी की मूर्ति गोस्वामी तुलसीदास जी के तप और पुण्य से स्वयं प्रकट हुई है. इस मंदिर के बारे में रोहित शर्मा बताते हैं कि कहा जाता है कि पहले यहां साक्षात् हनुमान जी रहते थे, लेकिन एक बार आश्रम में रहने वाले पंडित जी की पत्नी ने उनका पूंछ पकड़ लिया, जिसके बाद वो वहां से गायब हो गए. यहां भी मंदिर के अन्दर मोबाइल, कैमरा आदि ले जाना मना था.

दुर्गा मंदिर

बनारस में अस्सी रोड से कुछ ही दूरी पर आनंद बाग़ के पास दुर्गा कुंड नामक स्थान है. यहीं दुर्गा मंदिर है. इस मंदिर में अन्य दिनों की अपेक्षा नवरात्रि, सावन, मंगलवार और शनिवार को लोगों की भीड़ ज्यादा रहती है.

त्रिदेव मंदिर

त्रिदेव मंदिर

दुर्गा कुंड के पास ही संगमरमर के पत्थरों से निर्मित त्रिदेव मंदिर भी स्थित है. यह भव्य मंदिर राजस्थानी शैली में बना हुआ है. यहां तीन देवी देवताओं की मूर्तियों के कारण इसे त्रिदेव मंदिर कहा जाता है. जिस प्रकार राजस्थान में अलग अलग जगहों पर राणी सती, शालासर बाला हनुमान जी और खाटू श्याम के प्रसिद्ध मंदिर हैं, वैसे ही इन देवताओं की मूर्तियों के प्रतिरूप को इस मंदिर में स्थापित किया गया है.

तुलसी मानस मंदिर

तुलसी मानस मंदिर

श्री सत्यनारायण तुलसी मानस मंदिर भी बनारस के दर्शनीय स्थलों में से एक है. इस मंदिर का उद्घाटन 1864 में तत्कालीन राष्ट्रपति डॉ सर्वपल्ली राधाकृष्णन ने किया था. इस मंदिर की दीवारों पर श्री राम चरित मानस की चौपाइयों को उकेरा गया है. साथ ही यहां रंगीन रोशनियों, म्यूजिक और इलेक्ट्रॉनिक मोटर के माध्यम से भगवन राम और कृष्ण के बचपन की झांकी का भी प्रदर्शन होता है. जिसे देखने के लिए 4 रूपए का टिकट लगता है.

 

 

जायके वाली बनारसी गलियां

इस शहर की रवायतें और पौराणिक विरासत जितनी समृद्ध है, वैसे ही लुभाने वाली है यहां स्वाद की परंपरा. बनारस की गलियां अपने जायके के कारण भी जानी जाती है. कुल्हड़ वाली दूध, तरह-तरह के फ्लेवर वाली लस्सी, वो बड़े-बड़े दहीबड़े, रबड़ी इन गलियों से स्वादिष्ट आपको और कही नहीं मिलेंगे. यहां गुपचुप खाना हो तो रेवड़ी तालाब की ओर रुख कर सकते है. वहीँ सुबह के नास्ते में कचौड़ी-सब्जी और जलेबी का लजीज स्वाद लेना हो तो दशाश्वमेघ घाट के पास वाली दुकान से अच्छा शायद ही कहीं मिले. इसी के बगल में एक अलग पहचान बना चुकी चाय-कॉफ़ी की भी दुकान है, यहां चाय के चुस्की का आनंद हमलोगों ने भी उठाया. इसके अलावा यहां के संकट मोचन मंदिर के देसी घी वाले बेसन के लड्डू, श्रीराम स्वीट हाउस की मलाई गिलौरी का स्वाद भी आप कभी नहीं भूल पायेंगे.

बनारस भ्रमण अभी जारी है. बीएचयू, अस्सी घाट, रामनगर का किला जैसी अभी और भी कई जगहें हैं, जहां आपको ले चलेंगे और कराएँगे उन जगहों की खूबसूरती से आपको रूबरू.

 

 

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