कहते हैं अगर किसी इंसान को अपने इतिहास का पता नहीं है तो वो शख्स खोखला है. वही व्यक्ति जीवंत है जो अपने इतिहास, कुल, वंश, धर्म और पूर्वजों का ज्ञान रखता हो. अगर आपसे कोई पूछे कि आपके दादा – परदादा से पहले की पीढ़ी क्या करती थी तो निश्चित तौर पर आप सोच में पड़ जाएंगे.

लेकिन, हमें नाज है कि हम भगवान विश्वकर्मा के वंश से जुड़े हैं. प्राचीन धर्मग्रंथों की माने तो विश्वकर्मा को सृष्टि के रचयिता ब्रह्मा का सातवां धर्म पुत्र माना जाता है. भगवान विश्वकर्मा को निर्माण का देवता माना गया है. इनके द्वारा ही इंद्रपुरी, यमपुरी, वरुणपुरी, कुबेरपुरी, पांडवपुरी, सुदामापुरी, आदि का निर्माण किया गया. पुष्पक विमान समेत कर्ण का कुंडल, भगवान विष्णु का सुदर्शन चक्र, भोलेनाथ का त्रिशूल और यमराज का कालदंड इत्यादि वस्तुओं का निर्माण स्वयं भगवान विश्वकर्मा ने ही किया है. इन्हीं ज्ञान एवं विज्ञान के कारण हमारे आराध्य विश्वकर्मा न सिर्फ मनुष्यों बल्कि देवताओं में भी पूजित और वंदित हैं. इसी कारण अपने वंश पर हमें गर्व है कि हमसभी भगवान विश्वकर्मा की संतान हैं.

अपने दादाजी स्वर्गीय रामधारी विश्वकर्मा से मुझे हमारे पूरे खानदान, परिवार के इतिहास के बारे में विस्तार से जानकारी मिली. कैसे सालों पहले दौलतपुर सिमरी गांव में पहले पहल हमारे पूर्वज स्व. टेका राम मिस्त्री आकर बसे. फिर धीरे – धीरे एक के बाद एक पीढ़ियां आती गईं और इस इलाके में अपना प्रभुत्व जमाया. अंग्रेजों के ज़माने में जमींदारी भी की. इसी दौरान एक वक़्त ऐसा भी आया जब न्याय के लिए लड़ते हुए गिद्धौर के महाराजा के सामने भी नहीं झुके. हमारे परदादा स्वर्गीय रामनाथ विश्वकर्मा की हिम्मत ही थी जिसके कारण गिद्धौर के महाराज को जेल में डालने का आदेश ब्रिटिश सरकार को देना पड़ा.

दौलतपुर सिमरी में बसा हमारा विश्वकर्मा परिवार समाज के उत्थान में शुरू से ही आगे रहा है. तभी तो बच्चों के बेहतर शिक्षा दिलाने के लिए विश्वकर्मा प्राइमरी स्कूल खोला गया. फिर वो स्कूल आगे विस्तार पाते हुए मध्य विद्यालय और पुनः गांव और समाज के सहयोग से विश्वकर्मा उच्च विद्यालय के रूप में परिणत करवाया गया. वहीं लड़कियों में भी शिक्षा को बढ़ावा देने के लिए हमारे बुजुर्गों ने परदादी के नाम से गांव में सबसे पहले पावित्री देवी कन्या प्राथमिक विद्यालय की स्थापना की. इसके बाद फिर पावित्री देवी कन्या मध्य विद्यालय और पावित्री देवी कन्या उच्च विद्यालय भी गांव के लोगों के सहयोग से खोला गया. ये सभी स्कूल आज बिहार सरकार के शिक्षा विभाग द्वारा संचालित हो रहे हैं. वहीं, गांव में जब लड़कियों के लिए उच्च शिक्षा की जरुरत महसूस हुई तो दादी स्वर्गीय सुशीला देवी मेमोरियल ट्रस्ट की देखरेख में परदादी ब्रहावती देवी और परदादा रामनाथ विश्वकर्मा के नाम से बीआरएनवी महिला इंटर कॉलेज भी खुल गए. बिहार विद्यालय परीक्षा समिति की निगरानी में इसका संचालन किया जा रहा है.

तो ऐसा रहा है हमारे विश्वकर्मा वंश का इतिहास.

हालांकि, आज की पीढ़ी अपने पूर्वजों और बुजुर्गों को भूलने लगी है. रोजी – रोजगार के कारण गांव छोड़ना भी मज़बूरी है. ऐसे में, सालों साल पहले दौलतपुर सिमरी गांव में जिस विश्वकर्मा परिवार की वंशबेल स्वर्गीय टेका राम मिस्त्री ने लगाई थी, वो आज देशभर में लहरा रही हैं. इस विश्वकर्मा वंश के वंशज देश के हर कोने में हैं.

लेकिन ये और बात है कि जानकारी के अभाव में नई जेनरेशन अपने अतीत को ही नहीं पहचान पा रही है. अपने पुरखों के इतिहास से अनजान है.

ऐसे में, अपने सभी स्वर्गीय दादा – दादी जी के आशीर्वाद से मैं ये वंशावली बनाने की कोशिश कर रहा हूं, ताकि इसकी मदद से हमारा पूरा खानदान एकसूत्र में बंध जाए. अलग – अलग जगहों पर वंश की जो जड़ें फैली है वो एकजुट हो जाए. बस यही कामना है.

वैसे अपने खानदान से जुड़ी कई पुरानी जानकारी परिवार के कई बड़े सदस्यों से भी प्राप्त हुई, उन सबको भी तहे दिल से धन्यवाद.

तो चलिए, आपको मिलवाते हैं अपने दादाओं और परदादाओं से और जानते है कैसे पड़ी हमारे खानदान की नींव, और उस पुराने ज़माने से होते हुए पीढ़ी दर पीढ़ी कैसे बदले हम और आप.

वंशावली देखने से पहले इनका आशीर्वाद बहुत जरुरी है. तो इस तस्वीर पर क्लिक करें :

 

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