पूरी में भगवान जगन्नाथ मंदिर और बीच घूमने के बाद अगले दिन टूर पैकेज के अनुसार हमलोगों को चंद्रभागा समुंद्र तट, कोणार्क सूर्य मंदिर, भुवनेश्वर के प्रसिद्ध लिंगराज मंदिर सहित कई अन्य जगहों पर जाना था. इसके लिए होटल के बाहर सुबह में ही हमारी मिनी बस आकर लग गयी थी. हमलोग भी पहले से ही तैयार थे और होटल से चेक आउट कर अपने सभी सामानों को बस पर लेते हुए अगले सफ़र की ओर निकल पड़े.

रास्ते भर बस में हमलोगों की मस्ती चलती रही. हंसी-मजाक और फोटोग्राफी के बीच पता ही नहीं चला कि कब हमलोग पुरी से 30 किलोमीटर दूर आ गए. पूरी से यहां आते वक़्त सड़क और समुंद्र एकदम साथ साथ चल रहे थे, यह रास्ता पूरी-कोणार्क मैरिन ड्राइव कहलाता है. ऐसे में अपनी बस से समुंद्र को देखना बड़ा अच्छा लग रहा था. बस सबसे पहले चंद्रभागा बीच पर रुकी.

यह समुंद्र तट कोणार्क के प्रसिद्ध सूर्य मंदिर से करीब 3 किलोमीटर दूर है. पूरी के बीच से यह बीच हमलोगों को ज्यादा अच्छा लगा, यहां आपको शहर की भीड़भाड़ बिलकुल नहीं मिलेगी, यहां बीच के किनारे किनारे रेत पर खाली पैर चलने का अलग सुख है, हां इस दौरान अचानक कोई बड़ी लहर आकर आपको गीला कर देगी, और आप आश्चर्यचकित हुए बिना नहीं रह पायेंगे. यहां की लहरें बिलकुल दूध जैसी सफ़ेद थी, इसकी सुंदरता के कारण ही इस तट की तुलना देश के सबसे खूबसूरत तटों में होती है.

इस बीच पर हमें कोई भी नहाते नहीं दिखा, मैंने ध्यान दिया कि सभी यहां ट्रेवल पैकेज बुक करके आते हैं जिसमें  घूमने के लिए वक़्त निर्धारित होता है, अब ऐसे में दूधिया लहरों के बीच मस्ती के लिए समय ही कहां रहता है. साथ ही लहरें भी काफी तेज थी, ऐसे में यहां नहाना सेफ भी नहीं है. कहा जाता है कि पहले यहां चंद्रभागा नाम की एक नदी थी, जो यही आकर समुंद्र में मिलती थी, शायद यही कारण है कि इस जगह का नाम चंद्रभागा पड़ गया. लेकिन अब वो नदी सूख गयी है और उसका मुहाना भी सूखा पड़ा है. चंद्रभागा समुंद तट के पास भी कई छोटी छोटी दुकानें थी, जहां शंख, सीप की बनी वस्तुएं, टोपी सहित कई सजावटी चीजें बिक रही थी. यहां भी सबने जमकर खरीदारी की और जब थक गए तो पास के डाभ की दूकान पर धावा बोल दिया.

अब यहां से हमारी अगली मंजिल कोणार्क सूर्य मंदिर थी. 13वीं शताब्दी का ये सूर्य मंदिर अपनी वास्तुकला के कारण देश-विदेश के पर्यटकों को आकर्षित करता है. ऐसा माना जाता है कि इस मंदिर को पूर्वी गंगा साम्राज्य के महाराजा नरसिंहदेव-1 ने 1250 में बनवाया था. इस मंदिर की रचना पारंपरिक कलिंगा प्रणाली के अनुसार की गयी है. 865 फुट लंबे और 540 फुट चौड़े क्षेत्रफल में बना यह स्मारक अपनी संरचनाओं द्वारा पर्यटकों को आकर्षित करता है. भगवान सूर्य के रथ की तरह कोणार्क मंदिर का डिजाईन बना है. रथ में जिस तरह पहिए लगे होते हैं ठीक उसी तरह 12 पहिए इस मंदिर में भी बने है. दस फुट ऊंचे इस रथ को सात घोड़े खींच रहे हैं. मंदिर को पूर्व दिशा की ओर बनाया गया है. जिससे सुबह सुबह सूरज की रोशनी सीधे मंदिर के अन्दर पड़े. यह मंदिर यूनेस्को की विश्व विरासत सूची में शामिल है. यूनेस्को ने साल 1984 में इसे विश्व विरासत स्थल का दर्जा दिया था. मंदिर के गहरे रंग के कारण इसे काला पगोडा भी कहा जाता है.

यहां गेट से अन्दर जैसे ही आएं तो रास्ते के दोनों ओर छोटी-छोटी दुकानों की लंबी लाइन लगी थी. यहां सबसे पहले हमने टिकट लिया. जानकारी के लिए बता दें कि भारतीय नागरिकों के साथ साथ बांग्लादेश, नेपाल, भूटान, श्री लंका, पाकिस्तान, मालदीव, अफगानिस्तान और थाईलैंड देश के लोगों को कोणार्क मंदिर घूमने के लिए 30 रूपए का टिकट कटाना पड़ेगा, वहीं इन देशों के अलावा बाकी जितने देश है वहां के पर्यटकों को मंदिर के अन्दर जाने के लिए 500 रूपए खर्च करने होंगे. यहां कोणार्क मंदिर का पुरातत्व संग्रहालय भी है, जिसे आप देख सकते हैं. यह सुबह 9 बजे से लेकर शाम 5 बजे तक खुला रहता है. लेकिन अगर आप शुक्रवार को आयेंगे तो यह Archaeological Museum बंद मिलेगा.

कोणार्क मंदिर के बारे में हम और अच्छे से जान सके इसलिए हमलोगों ने वहां मौजूद एक गाइड को हायर कर लिया. उसने मंदिर से जुड़ी सभी जानकारियां हमलोगों को दी, साथ ही मंदिर में उकेरे गए हर एक कलाकारी से भी परिचित कराया. वैसे जब गाइड मंदिर के बारे में बता रहे थे तो मैंने अपने मोबाइल से उसकी रिकॉर्डिंग कर ली थी, जिसे अब आप भी देख सकते हैं.

कोणार्क मंदिर घूमने के दौरान एक और चीज हमने देखी.  हमलोग जब कोणार्क मंदिर घूम लिए और लौटने लगे तो अचानक बारिश होने लगी. और वहां भाड़े के छाते खूब मिलने लगे. शायद वहां हमेशा बारिश होती होगी तभी स्थानीय लोगों ने यह कारोबार भी शुरू कर रखा है. कई लोगों के हाथों में दस-दस, बीस-बीस छाते लिए देखा, बारिश से बचने के लिए वो लोगों को कुछ देर के लिए उसे बीस-बीस रूपए में दे रहे थे. पहले तो हमें लगा कि वो बीस रूपए में छाता बेच रहे फिर जब सच्चाई पता चली तो खूब हंसे. खैर, हमलोगों के पास भी कोई चारा नहीं था इसलिए सब भाड़े का छाता लेकर बस के पास पहुंचे, जो एक रेस्टुरेंट के पास लगी थी. अब तक दोपहर हो चुकी थी और पेट में चूहे भी कूदने लगे थे. इसलिए उस रेस्टुरेंट में सबने अपने अपने फेवरेट खाने का आर्डर किया और खाकर अगले सफ़र के लिए एक बार फिर से तैयार हो गए.

कोणार्क के बाद हमारी गाड़ी आगे धौलागिरी जिसे धवलगिरी भी कहते हैं, उस ओर बढ़ने लगी. यह भुवनेश्वर से करीब 8 किलोमीटर दूर है. दया नदी के तट पर स्थित इस पहाड़ी पर बौद्ध शांति स्तूप देखने में काफी खुबसूरत है. इसे देखने पर राजगीर और वैशाली भ्रमण की याद आ गयी, वहां भी बिलकुल ऐसा ही स्तूप बना है. या यूं कहे कि इस शांति स्तूप के बनने का श्रेय भी हमारे राज्य बिहार को ही जाता है.

ऐसा मैं इसलिए कह रहा हूं कि अपने देश भारत में सबसे पहला शांति स्तूप का निर्माण राजगीर में ही हुआ है. साल 1969 में जब राजगीर के शांति स्तूप भवन का उद्घाटन हो रहा था तब बिहार के तत्कालीन राज्यपाल Sri Nitryananda Kanungo भी उपस्थित थे. उसी वक़्त उन्होंने यह निर्णय किया कि ठीक ऐसे ही शांति स्तूप का निर्माण वो अपने राज्य ओड़िशा में भी कराएंगे. यह उनके प्रयासों का ही नतीजा था कि धौलागिरी का यह स्तूप दो साल में बन कर तैयार हो गया. जिसके बाद 8 नवंबर, 1972 को इसका उद्घाटन हुआ.

इतिहास की चर्चा करें तो 260 ईसा पूर्व में दया नदी के इसी तट पर कलिंग का युद्ध लड़ा गया था, इस युद्ध में इतना रक्तपात हुआ की नदी का पानी खून से लाल हो गया. इसे देख कर सम्राट अशोक का ह्रदय परिवर्तन हो गया और फिर उन्होंने बौद्ध धर्म अपना लिया, यह शांति स्तूप उस घटना की ही याद दिलाता है. यहां भी हमने अलग अलग पोज में खूब फोटो खिंचवाई. स्तूप देख कर जब नीचे उतरे तब तक शरीर में थकान आ गयी थी, जिसे दूर करने के लिए सबने यहां मिल रहा नींबू और पुदीना मिला ठंडा ठंडा गन्ने का जूस पीया, फिर अपने बस में सवार हो गये भुवनेश्वर जाने के लिए.

भुवनेश्वर को मंदिरों की नगरी भी कहते हैं. यहां देवों के देव महादेव का निवास है. कहा जाता है कि इस तीर्थ को तीनों लोकों के स्वामी श्री त्रिभुनेश्वर ने स्वयं ही प्रकट किया था. पुराणों में भुनेश्वर शहर का वर्णन एकाम क्षेत्र के नाम से किया गया है. कहते हैं कि काशी में जब सभी देवी-देवता बस गए, तो भगवान शंकर को एकांत में रहने की इच्छा हुई. भगवान को एकाम क्षेत्र की सुन्दरता अच्छी लगी. इस क्षेत्र में तब भगवान अनंत वासुदेव का एकाधिकार था, भगवान शंकर ने उनसे कुछ वक़्त यहां रहने की अनुमति मांगी. तब भगवान अनंत वासुदेव ने उन्हें हमेशा के लिए यहीं रहने की विनती की, जिसे भगवान शंकर ने स्वीकार किया और हमेशा के लिए लिंगराज के रूप में यही बस गए. लिंगराज मंदिर में  स्थापित लिंग पूरी तरह शिवलिंग न होकर हरिहर लिंग है, यानि इसका आधा भाग शिव का और आधा विष्णु का है. इस मंदिर की यही विशेषता इसे बाकी शिवलिंगों से अलग करती है. दसवीं शताब्दी का यह मंदिर हजारों साल की आस्थाओं और परम्पराओं का प्रतीक है.

इस मंदिर के काफी दूर हमारी बस रुक गयी. ड्राईवर ने बताया कि इससे आगे जाने की परमिशन नहीं है. आपलोगों को यहां से उतर कर ही मंदिर जाना होगा. हमें यह भी बताया गया कि मंदिर में मोबाइल, कैमरे ये सब ले जाना मना है. ऐसे में सबने अपने मोबाइल, कैमरे, बेल्ट, वालेट आदि बस में ही छोड़ दिया और खाली हाथ चल पड़े भगवान के दर्शन के लिए. लेकिन यह काम मुझसे नहीं हो पाया, अरे इतनी दूर से घुमक्कड़ी करने यहां पहुंचा हूं, ऐसे में मोबाइल छोड़ कर जाऊंगा तो फोटो कैसे ले पाऊंगा. इसलिए मैंने अपना फोन साथ रखा और फिर चल पड़े हमलोग लिंगराज मंदिर की ओर. यहां बाहर में ही काउंटर बने है जहां जूते-चप्पल और मोबाइल वगैरह जमा किये जा रहे थे. मंदिर के बाहर पहले तो कई फोटोज लिया उसके बाद मोबाइल जमा कर हमलोग मंदिर के अन्दर दाखिल हुए.

मुख्य द्वार से अन्दर प्रसाद और फूल की बिक्री हो रही थी. अंदर पहुंचा तो देखा मंदिर परिसर काफी बड़ा था, यहां लिंगराज के मुख्य मंदिर के अलावे बहुत सारी छोटी-छोटी मंदिरें थी. सबसे पहले हम सभी मुख्य मंदिर में जाने के लिए कतार में खड़े हो गए. अन्दर पहुंचा तो देखा देश के सभी मंदिरों जैसा हाल यहां भी था. मंदिर के अन्दर भगवान लिंगराज काफी बेचारे नजर आ रहे थे. मुझे ऐसा महसूस हो रहा था मानों उनके कथित भक्तों का उनपर कब्ज़ा है, जो भगवान का डर दिखा कर पूजा-पाठ कराने के नाम पर दूर दूर से आने वाले हम जैसे सीधे भक्तों से जमकर वसूली करने में लगे थे.

खैर मेरी भक्ति तो बस हाथ जोड़ श्रद्धा से सिर झुकाने तक ही रहती है, और उतनी भक्ति तब तक मैं हरिहर लिंग की कर चुका था. पंडों के लाख टोकने पर भी सीधे बाहर निकल आया. धीरे-धीरे जब हमारी टोली के सभी सदस्य दर्शन कर बाहर आये तब हमलोग साथ-साथ लिंगराज मंदिर की परिक्रमा करने लगे, इस दौरान मंदिर की खुबसूरत बनावट से हमारी नजर ही नहीं हट रही थी. मंदिर परिसर में जितने मंदिर थे बारी-बारी से सबके दर्शन किये. हां, इन छोटे मंदिरों में वसूली के लिए कोई पंडा नजर नहीं आया. मुझे यहां के सभी देवी-देवता आजाद लगे. हम भी यहां  स्वछंद होकर अपने भगवान से मिल रहे थे, जी भर कर उनके दर्शन कर रहे थे. सच कहूं तो मुख्य मंदिर से ज्यादा अच्छा इन छोटे मंदिरों में शीश नवा कर लगा. मन को यहां सच में शांति मिल रही थी. पर एक मलाल था कि फोटो नहीं ले सकता था. उस वक़्त मोबाइल की कमी खल रही थी. अगर पास में मोबाइल होता तो इन पंडों के वसूली की वीडियो सच में बनाता. मन में एक बात यह भी आई कि सुरक्षा के नाम पर जो मोबाइल बाहर जमा करने का सभी बड़े मंदिरों में रिवाज आजकल चल रहा है, कहीं उसके पीछे की वजह ये तो नहीं कि मंदिर के अन्दर इन पंडों का असली चेहरा बाहर न आ जाए. गर्भ गृह में इनकी हरकतों का कहीं कोई वीडियो बना कर वायरल न कर दें,  इस डर के कारण तो मोबाइल बाहर जमा नहीं करवा लिया जाता.

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आखिर हमारे पटना में भी तो पटना जंक्शन के पास प्रसिद्ध महावीर मंदिर है, यहां भी श्रद्धालुओं की भारी भीड़ उमड़ती है, लेकिन यहां ऐसा कोई नियम नहीं है. लोग आराम से मोबाइल लेकर मंदिर के अन्दर जाते हैं, मस्त सेल्फी लेते हैं. भगवान की पूजा करते हैं और ख़ुशी-ख़ुशी आशीर्वाद लेकर बाहर आ जाते हैं. पंडे-पुजारी यहां भी हैं, सुरक्षा के लिए पुलिस बल भी तैनात रहती है. लेकिन इनका बर्ताव देश के अन्य मंदिरों जैसा नहीं होता. खैर मन ही मन इन सब बातों को सोचता हुआ मंदिर की परिक्रमा पूरी किया और बाहर निकल गए. बाहर एक बार फिर फोटो सेशन का दौर चला. उसके बाद अपने बस की ओर पैदल ही रवाना हुए.

भुवनेश्वर यात्रा के अब अंतिम पड़ाव पर हमलोग थे. वैसे तो पैकेज के अनुसार अभी बहुत कुछ हमें देखना बाकी रह गया था, लेकिन रात में हमारी वापसी की ट्रेन थी. और वक़्त को देखते हुए हमें पूरी लौटना भी था. इसलिए हमारी भुवनेश्वर यात्रा यही ख़त्म हुई और वापस चल पड़े पूरी की ओर. घूमते-फिरते यह पूरा दिन कैसे बीत गया पता भी नहीं चला.

अब तक अंधेरा भी घिर आया था और तेजी से हमारी बस पूरी जाने वाली सड़कों पर दौड़ने लगी थी. भूख भी जबरदस्त लगी थी. ऐसे में पूरी पहुंच कर सबसे पहले हमलोगों ने यहां ग्रांड रोड स्थित एक होटल में खाना खाया और आ गये ट्रेन पकड़ने पूरी स्टेशन. वैसे ट्रेन में हमलोगों के साथ जो हुआ उसका जिक्र किए बिना भुवनेश्वर की यह यात्रा वृतांत पूरी नहीं हो सकती.

हिंदी का ‘सफर’ भारतीय रेल में चढ़ते ही अक्सर अंग्रेजी के ‘सफर’ में बदल ही जाता है। पूरी से सासाराम लौटते वक्त इस ‘सफर’ को हमलोगों ने भी झेला। दरअसल, पुरी यात्रा के दूसरे दिन दिनभर हमलोगों की घुमक्कड़ी चली, इस दौरान घूमने गए उन जगहों की मोबाइल से कई फोटोज और वीडियो हमलोगों ने लिया। रात में पौने दस बजे हमारी ट्रेन थी, और ट्रेवल एजेंसी वाले से यह डील हुई थी कि टूर पैकेज में जितने भी दर्शनीय स्थान हैं उन्हें देखने के बाद वो हमलोगों को #पुरी स्टेशन छोड़ देंगे, तय समय पर हमलोग #स्टेशन पहुंच भी गए, लेकिन दिनभर मोबाइल से कभी सेल्फी तो कभी फेसबुक लाइव और तस्वीरें क्लिक करते रहने से उसकी बैटरी जवाब दे गई। हालांकि उस वक़्त यह हमें कोई बड़ी समस्या नहीं लगी, सोचा ट्रेन में #मोबाइल चार्ज करने के लिए चार्जिंग पॉइंट तो हर सीट पर उपलब्ध होता है ही, आराम से हो जाएगा, इसलिए घूमने के दौरान साथ लाए पावर बैंक का भी खूब इस्तेमाल किया।

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पुरी स्टेशन पहुंच कर जब हम अपनी ट्रेन पुरुषोत्तम एक्सप्रेस में दाखिल हुए और चार्जिंग पॉइंट में मोबाइल चार्जर को लगाया तो उसके बावजूद मोबाइल बेजां पड़ा रहा। न ही फोन की स्क्रीन चमकी और न ही चार्जर की बत्ती जली। पहले तो हमें लगा कि सिर्फ मेरे ही सीट का पॉइंट खराब है, पर उस डिब्बे में तो हमलोगों की 24 सीटें आरक्षित थी और सब अपने अपने मोबाइल लेकर परेशान हुए जा रहे थे। कभी कोई अपना मोबाइल ऑन-ऑफ कर रहा था तो कोई चार्जर को निकाल कर फिर से लगाने की कोशिश में था, शायद ऐसा करने से कोई तार तो कनेक्ट हो जाये, पर सब व्यर्थ। एक-एक करके उस पूरे डिब्बे को चेक कर लिया लेकिन कहीं कोई पॉइंट काम नहीं कर रहा था। अब परेशान होने की बारी हमारी थी, क्योंकि रात के अभी तो 10 ही बज रहे थे और इस ट्रेन में हमें अगले दिन शाम 4 बजे तक रहना था।ऐसे में बिना फोन के हम करेंगे क्या, हमें तो जल्दी थी अपनी यात्रा के दौरान खिंचे उन फ़ोटो को सोशल साइट पर डालने की, एक दूसरे को दिखाने की और दूसरे के मोबाइल में खींची और तस्वीरों को अपने मोबाइल में डालने की, पर जब किसी का फोन ही चार्ज नहीं है तो यह सब भला होगा कैसे?

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अब हमें इस भारतीय रेलवे पर गुस्सा आ रहा था। थोड़ी देर में टीटीई आया, तो उससे इसकी शिकायत की। उससे ट्रेन में मौजूद रहने वाला कंप्लेन बुक मांगा, पर उसने भी इस ओर ध्यान नहीं दिया। सोचा ट्विटर पर ट्वीट करूं, लेकिन उसके लिए भी मोबाइल का ऑन रहना जरूरी था। इधर रात गहरा रही थी, और हमलोग अपने मोबाइल चार्ज करने के लिए बेचैन हो रहे थे। कुछ देर बाद अपनी बोगी के बगल वाले डिब्बे में गए तो देखा वहां चार्जिंग पॉइंट काम कर रहा था, फिर क्या था दूसरे की सीट पर बैठ कर अपना मोबाइल चार्ज करने लगे, हालांकि दिनभर की थकान के कारण नींद भी हमपर हावी हो रही थी, इसलिए आधे घंटे के बाद चार्जर निकाल कर वापस अपने कूपे में आ गए। अगली सुबह जब सो कर उठे तो सबसे पहले रेल मंत्रालय और रेल मंत्री सुरेश प्रभु को ट्वीट किया, लेकिन भूल गया था रेलवे भी तो सरकारी तंत्र का ही हिस्सा है। बस एक रिप्लाई ‘इश्यू इज फॉरवर्ड टू कन्सर्न ऑफिसर’ जो प्रायः हर ट्वीट के बाद आपको लिखा मिल जाएगा, वो मुझे भी मिल चुका था, और मैं उसे ही पढ़ कर खुश हुआ जा रहा था कि रेल मंत्री को हमारी परेशानी पता चल गई, अब हमारी समस्याओं का जल्द समाधान हो जाएगा।

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लेकिन समय बीतता जा रहा था, कई स्टेशनों पर गाड़ी रुक रही थी, बढ़ रही थी, और हमारी समस्या यूं ही बरकरार रही। अभी हम रेलवे पर अपनी खीज उतार ही रहे थे तभी एक और टीटीई पहुंचा, हमने उससे बात की और कहा कि प्लीज कुछ कीजिये, नहीं तो कंप्लेन बुक हमें उपलब्ध कराइये। पहले तो उसने भी इस बात की अनदेखी की पर जैसे ही मैंने ट्वीट वाली बात बताई वो अचानक से एक्टिव हो गया। तुरंत रेलवे के कमर्शियल डिपार्टमेंट को फोन लगाया और बात किया। फिर कहा कि देख लीजिए, अगर बोकारो तक ठीक नहीं होता है तो आपको कंप्लेन बुक दे देंगे। रात भर तक तो इंतजार किया ही था, सोचा दो स्टेशन और देख लेता हूं। ट्रेन बोकारो पहुंची, और आधे घंटे से भी ज्यादा देर तक वहां रुकी। लेकिन इस दौरान भी रेलवे का कोई कर्मचारी मेंटेनेंस के लिए नहीं पहुंचा, हालांकि इस बीच हमें भरोसा देने वाला वो टीटीई हमारे पास आकर मेरे टिकट का पीएनआर नं., नाम, सीट नं आदि कई जानकारी लेकर चला गया। अब ट्रेन बोकारो से खुलकर गोमो भी पार कर गयी, लेकिन न तो उस टीटीई की बातें सच हुई और न ही ट्वीटर वाले प्रभु ने अपना कोई असर दिखाया। इधर मैं लगातार ट्वीटर पर कभी संबंधित जोन के डीआरएम को ट्वीट कर रहा था तो कभी मिनिस्ट्री ऑफ रेलवे को अपनी समस्या याद दिला रहा था, पर कुछ काम न आया। शायद उनलोगों ने यह ठान लिया था कि किसी ट्वीट का जवाब मुझे नहीं देना है।

मैंने भी सोच लिया कि अब ट्वीट करना छोड़ो, सीधे कंप्लेन बुक पर ही अपनी शिकायत दर्ज की जाए। रात से लेकर सुबह तक मैंने 3-4 टीटीई से कंप्लेन बुक मांगा पर सब इसे लेकर टाल-मटोल कर रहे थे। मुझे आश्चर्य हो रहा था कि आखिर वो इसे देने में कतरा क्यों रहे। अंत में जब हेड टीटीई के पास जाकर मैंने इस बात की चर्चा की, तो उसने भी मुझे यहीं समझाने की कोशिश की कि इससे क्या होगा, आपकी शिकायत से कुछ नही होने वाला, इसे पहुंचने में एक हफ्ते लगेंगे वगैरह-वगैरह।
पर मैंने भी ठान लिया था, चाहे जो हो जाये मैं अपनी शिकायत तो लिख कर ही जाऊंगा, टीटीई के सामने मैं भी अड़ा रहा और कंप्लेन बुक में अपनी शिकायत लिख कर ही माना।
हां, मुझे नहीं मालूम कि मेरे ऐसा करने से समस्या दूर होगी या नहीं पर मैं इतना जरूर जानता हूं कि रेल में सफर के दौरान मुझे जो सुविधा मिलनी चाहिए थी और जिसका मैं हकदार भी था, रेलवे ने मुझे उससे वंचित रखा, और एक सजग रेल यात्री होने के नाते मैंने अपनी उन सुविधाओं के लिए आवाज उठाया, जो प्रायः कई लोग ऐसा नहीं करते, सिर्फ यह सोच कर की क्या होगा…
आप यह सोचिये की उस दिन उस कूपे के सभी यात्री जो खुद चार्जिंग पॉइंट खराब रहने के कारण परेशान थे, अगर उन्होंने भी सजगता दिखाते हुए शिकायत पुस्तिका में अपनी परेशानी बयां की होती तो कम से कम उसके 60 से 70 पन्ने रेलवे के लापरवाह कर्मचारियों के लिए भारी पड़ते।

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