बिहार के सारण और वैशाली जिले के सीमा पर मोक्षदायिनी गंगा और गंडक नदी के संगम पर हर साल लगने वाला एशिया का सबसे बड़ा पशु मेले का सोनपुर में शुभारंभ हो गया है. हरिहर क्षेत्र मेला और छत्तर मेला के नाम से भी अपनी पहचान रखने वाला ये मेला हर साल कार्तिक पूर्णिमा से शुरू होता है, जो अगले एक महीने तक चलता है. इस मेले में न सिर्फ पशुओं की बिक्री होती है, बल्कि पूरे एक महीने तक ये भगवान की आराधना के साथ घूमने – फिरने के लिए भी बेहतरीन जगह है. तभी तो यहां देशी – विदेशी पर्यटक भी खिंचे चले आते हैं. यहां आप तरह – तरह के जानवरों को देखने के साथ कई लजीज व्यंजनों का भी लुत्फ़ उठा सकते हैं. विश्व प्रसिद्ध सोनपुर मेले की खासियत है कि यहां विशालकाय हाथी से लेकर छोटी सुई तक मिलता है, इसके साथ मेले में लगने वाला थियेटर शो भी लोगों को अपनी ओर खूब आकर्षित करता है, जहां बार गर्ल्स अपनी अदाओं और डांस से लोगों का मन मोह लेती हैं.

सोनपुर मेले के बारे में ऐसे ही कई खास बातें आपको आगे बताते हैं.

  1. सोनपुर मेला की शुरुआत मौर्यकाल से हुई थी. चन्द्रगुप्त मौर्य अपनी सेना के लिए इसी मेले से हाथी खरीदते थे. स्वतंत्रता आंदोलन में भी सोनपुर मेला क्रांतिकारियों के लिए पहली पसंद कहा जाता था.
  2. सोनपुर मेले के बारे में पुराने लोग बताते हैं कि एक वक़्त ऐसा भी था जब यहां सब कुछ मिलता था. पशु – पक्षी के अलावे गुलाम महिला – पुरुष की भी खरीद बिक्री होती थी. बाद में धीरे – धीरे ये बंद हो गया.
  3. आज जहां सोनपुर मेला लगता है, उसकी धार्मिक मान्यता भी है. हरिहर क्षेत्र पौराणिक कथा गज – ग्राह युद्ध से भी जुड़ा है. यहां के गंडक नदी में गज (हाथी) और ग्राह (मगरमच्छ) के बीच सालों तक युद्ध चला. बताया जाता है कि गजेन्द्र अपनी हथिनियों के साथ नहाने नदी में उतरे थे, तो एक ग्राह ने उनका पैर पकड़ लिया. जिसके बाद दोनों के बीच लंबा युद्ध छिड़ गया. काफी बलवान होने के बाद भी जब पानी में गज कमजोर पड़ गया, तभी नदी में उसे एक कमल का फूल दिखाई पड़ा. गज ने उससे भगवान विष्णु की आराधना की और उन्हें पुकारा, तब भगवान नारायण ने कार्तिक पूर्णिमा के दिन यहां के कोनहारा घाट घाट के पास ग्राह का वध किया.
  4. गज – ग्राह के बीच युद्ध और फिर भगवान विष्णु के प्रयास से युद्ध विराम होने के कारण यहां पशुओं का बड़ा मेला लगने लगा. इसी जगह हरि (विष्णु) और हर (शिव) का हरिहर मंदिर भी है. लोगों का ये विश्वास है कि जब भगवान राम सीता स्वयंवर में शामिल होने मिथिला जा रहे थे तब उन्होंने इस मंदिर का निर्माण किया था. हरिहरनाथ का मंदिर दुनिया का एकमात्र ऐसा मंदिर है जहां भगवान विष्णु और भोलेनाथ की एकीकृत मूर्ति है.
  5. सोनपुर मेले के दौरान कई जगहों पर बीमारियों और बुरी आत्माओं से बचाने के लिए यज्ञ और हवन किया जाता है.  देशभर के साधु-संतों का भी जुटान होता है. ऐसे में सोनपुर का साधु गाछी इलाका तो भजन कीर्तन और साधना का केंद्र बन जाता है.
  6. यहां चिड़ियों और अच्छी नस्ल के कुत्तों के लिए अलग बाजार लगता है. हालांकि चिड़ियों और हाथियों की खरीद – बिक्री पर रोक है, फिर भी मेले का आकर्षण बना रहे, इसे लेकर भी पशु मालिक उन्हें यहां लेकर आते हैं.    
  7. सोनपुर मेले में विदेशी पर्यटकों के लिए खास व्यवस्थाएं रहती है. बिहार सरकार के पर्यटन विभाग की ओर से उनके खाने-पीने और ठहरने के लिए विशेष इंतजाम किए जाते हैं. सोनपुर मेले के खुबसूरत नज़ारे को अपनी आंखों और कैमरे में कैद करने के लिए जापान, फ्रांस, श्रीलंका, नेपाल आदि देशों से टूरिस्ट आते हैं. इस बार भी इनके लिए स्विस कॉटेज बनकर तैयार हैं, जिसमें बेड से लेकर बाथरूम तक सभी पूरी तरह हाईटेक होते हैं. इसके लिए 60 से भी ज्यादा विदेशी सैलानियों ने बुकिंग कराई है.
  8. मेले में पूरे देश के अच्छी नस्ल के घोड़ों की खरीद – बिक्री होती है. दूर – दराज से घोड़े खरीदने यहां लोग आते हैं. इस बार भी बड़ी संख्या में पशुओं के आने से सोनपुर का पशु बाजार गुलजार होने लगा है.
  9. आजादी से पहले सोनपुर मेला साहित्यिक गतिविधियों का भी बड़ा केंद्र हुआ करता था. यहां राहुल सांस्कृत्यायन, आचार्य जानकी वल्लभ शास्त्री, आचार्य शिवपूजन सहाय, रामवृक्ष बेनीपुरी, जैसे कई बड़े साहित्यकार भी आ चुके हैं. तब इस मेले में भी गीत – संगीत और शेरो – शायरी की दिलकश छटा बिखरती थी. यहां बिहार हिंदी साहित्य सम्मेलन का सम्मेलन भी हुआ करता था. सोनपुर के इस मेले के बारे में राहुल सांस्कृत्यायन ने अपनी किताब वोल्गा से गंगा तक में सोनपुर के इस मेले का जिक्र किया है. वहीं, आचार्य जानकी वल्लभ शास्त्री ने तो मेला घूमने के बाद एक लंबी कविता ही लिख दी थी. पर अब बढ़ते बाजारवाद में सोनपुर मेले का साहित्य से लगाव खो सा गया है.
  10. सोनपुर मेला की बात हो और थियेटर की चर्चा न हो, तो कुछ अधुरा सा लगता है. क्योंकि अब यहां के थियेटरों के शोरगुल से ही ये मेला गुलजार हो रहा है. रात होते ही इन थियेटरों में बार गर्ल्स की अश्लील डांस देखने लोगों की भीड़ उमड़ पड़ती है.

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