तल्ख़ धुप, गर्म हवाओं के थपेड़े, पसीने से तरबतर दिन तो उमस से भरी रातें. पटना में  मौसम के इस गर्म मिजाज को सहते हुए अचानक मौका मिल जाये किसी हिल स्टेशन जाने का तो फिर क्या कहना.

इस भीषण गर्मी को झेलते हुए अचानक प्लान हुआ की हमें पहाड़, बर्फ और बादलों के बीच चलना है. बस सुनना भर था कि मन बादलों में उड़ने लगा. सिक्किम जाने की पूरी योजना दी और जीजू ने बनाई थी. साथ में उनके दो फ्रेंड्स और उनका परिवार भी था. इस तरह बड़े और बच्चे सहित हमलोग चौदह लोग थे. कैपिटल एक्सप्रेस में हमारा रिजर्वेशन था.

ट्रेन रात में थी. अगले दिन करीब एक बजे हमलोग न्यू जलपाई गुड़ी रेलवे स्टेशन पर उतरे. यहां स्टेशन पर ही सबसे पहले हमने टूरिज्म डिपार्टमेंट के काउंटर पर इन्क्वारी की. वहां के कर्मचारी ने घुमने लायक जगहों के बारे में विस्तार से बताया. साथ में उन जगहों की जानकारी देने वाले कई पम्पलेट भी फ्री में मिले. हमें यहां से पहले सिक्किम की राजधानी गंगटोक पहुंचना था. इसके लिए शेयर और रिजर्व्ड दोनों प्रकार की गाड़िया चलती है.

काउंटर पर ही हमें बताया गया कि शेयर गाड़ी में प्रति व्यक्ति चार्ज करीब 250 से 300 रुपये और रिज़र्व गाड़ी दो हजार से ढाई हजार के बीच आएगा. चूंकि साथ में बच्चे भी थे इसलिए हमने एन.जे.पी. में ही एक टूर एंड ट्रेवल एजेंसी को 60 हजार दे कर टूर पैकेज बुक कर लिया. इसमें हमारे रहने, खाने-पीने से लेकर घुमाने तक का सारा इंतजाम ट्रेवल एजेंट को करना था. गाड़ी पर बैठ कर वेस्ट बंगाल से हमलोग आगे बढ़ रहे थे. अभी कुछ ही दूर बढे थे कि चूहों ने पेट में उछल-कूद करना शुरू कर दिया. लिहाजा ड्राईवर ने एक होटल के सामने गाड़ी रोकी और हमलोगों ने डट कर खाने का मजा लिया. पेट भरने के बाद हम लोग अब पूरी तरह से तैयार थे अपने आगे के सफ़र यानी देश के दुसरे सबसे छोटे राज्य सिक्किम में प्रवेश करने को.

सड़क के बगल से गुजरती और हमें रास्ता दिखाती तिस्ता नदी भी हमारे साथ साथ चल रही थी, जिसकी कभी तेज तो कभी धीमी होती अलखाती-बलखाती लहरों को देख हम सभी कभी रोमांचित हो रहे थे तो कभी उसके साथ साथ पहाड़ों के मेल से बने प्राकृतिक सौन्दर्य में खो रहे थे. प्रकृति की छटा ऐसी थी कि रास्ते भर कैमरा हाथों में रहा और उंगली कैमरे के क्लिक बटन पर. क्या करे एक के बाद एक इतने सुन्दर सुन्दर दृश्य जो आ रहे थे. लग रहा था सबको अपने साथ कैमरे में भरता चलूं. हम सभी रास्ते भर इसी ख्वाबों में डूबे रहे कि जब सफ़र का आगाज इतना खुबसूरत है तो जहां हम जा रहे है उसकी खूबसूरती का आलम कैसा होगा. हमारी पहली मंजिल गंगटोक थी, जहां हमें पहले पहुंचना था. रात करीब नौ बजे हम लोग अपने होटल उतरे. उस वक़्त हलकी हलकी बारिश हो रही थी. मौसम भी सर्द था.

पिछले रात से इस रात तक गाड़ी में रहने के कारण शरीर बिलकुल थक चुका था. हमलोग जल्दी जल्दी फ्रेश हुए. नल खोला तो पानी बर्फ जैसा ठंडा था, पर थैंक गॉड की हमारे कमरों के अटैच्ड बाथरूम में गीजर लगा था. फ्रेश हो कर निकले और कुछ देर बाद चाय पीते पीते होटल के टैरेस पर पहुँचे. वहां से शहर का नजारा बड़ा सुन्दर दिख रहा था. रात होने के कारण ज्यादा तो कुछ नहीं दिखा पर पहाड़ों पर बिजली के जलते बल्ब ऐसे लग रहे थे कि मानों आसमान से उतर कर तारे पहाड़ों पर जगमगा रहे हो. इसी बीच होटल के मैनेजर ने बताया की कल जहां जाना है उसके लिए परमिट बनाना होगा. और उसके लिए सभी लोगों का फोटो चाहिए. होटल में ही हमलोगों का फोटो सेशन हुआ. फिर होटल के काउंटर पर सभी लोगों के पहचान पत्र की फोटो कॉपी जमा की.

तब तक दस बज चुके थे और हमलोग डिनर के लिए होटल के कैंटीन पहुँचे. होटल वाले ने हमें कल के टूर के बारे में बताया और कहा कि कल सुबह आठ बजे तक तैयार हो जाइएगा. अगले दिन भारत और चीन के बॉर्डर पर नाथूला दर्रा का प्रोग्राम था. सुबह जल्दी उठना था और हम सभी थक भी गए थे इसलिए अपने – अपने कमरे में घुसते ही रजाई में दुबक गये.

अगली सुबह हमलोग तय समय के अनुसार तैयार थे, पहाड़ों पर बादलों संग उड़ान भरने को. जैसे ही गाड़ी आई उस पर सवार होकर घुमावदार पथरीले पहाड़ी रास्ते से होते हुए अपने रोमांचकारी सफ़र पर नाथूला की ओर निकल पड़े. नाथूला दर्रा हिमालय का एक प्रसिद्ध पहाड़ी दर्रा है. जो 14,200 फीट की उंचाई पर है. इसे 1962 ई. में भारत और चीन के बीच होने वाले लड़ाई के बाद बंद कर दिया गया था. बाद में 5 जुलाई 2006 को इसे फिर से खोल दिया गया.

यहां जाते वक़्त रास्ते में ऊंचे ऊंचे पहाड़ों की घाटियां दिखाई दे रही थी. लम्बे और हरे भरे देवदार के जंगल आंखों को एक अलग सुकून दे रहे थे. जंगल, झरने और बादलों से होते हुए हमारी गाड़ी ऊपर की ओर जा रही थी. ऊपर से जब नीचे घाटियों की ओर देखता तो बादल तैरते मिलते. बिलकुल वही दृश्य जब कोई प्लेन में बैठा नीचे देखता है. उस सुन्दर पल और उस नज़ारे को बयां कर पाना बहुत ही मुश्किल. ग्रेजुएशन के वक़्त जियोग्राफी में पढ़ा था कि जैसे जैसे हम ऊपर जाते है तापमान में कमी आती है. आज उसे अनुभव भी करने का मौका मिल गया था. सच में ठंड ज्यादा बढ़ गयी थी. बीच में ड्राईवर ने एक जगह गाड़ी रोकी. इस ठंड से बचने के लिए जैकेट, टोपी वगैरह लेनी थी. यहां भाड़े पर सब कुछ मिलता है. तब तक चाय की भी तलब हो रही थी.

खुद को गर्माहट देने के लिए यह जरुरी भी था. इसलिए सबने इस ठन्डे प्रदेश में गर्मागर्म चाय की चुस्की ली. करीब आधा-एक घंटा रुकने के बाद अपने आगे के सफ़र पर निकले. रास्ते भर जबर्दस्त चढ़ाई थी. कहीं कहीं रास्तों के मरम्मत का भी काम चल रहा था.

करीब पांच घंटे की अनवरत यात्रा के बाद आखिरकार हमलोग एक बजे नाथूला पहुँचे. गाड़ी नीचे रुकी. अब हमें 128 के आसपास सीढियां चढ़ कर ऊपर जाना था.

धीरे धीरे हमलोगों ने पैदल अपनी ये भी चढ़ाई पूरी की. ऊपर पहुंच कर एक अद्भुत नजारा दिखा. चारों ओर बर्फ में लिपटी सफ़ेद पहाड़, उनके नीचे रुई के फाहे सा तैरते बादल, ठंडी हवाएं, ठण्ड से कांपते हाथ और मुंह से निकलते भाप, एक नया अनुभव, अलग अहसास. पटना के मौजूदा मौसम से बिलकुल अलग था यहां का वातावरण.

इस दौरान हम सभी थक गए थे, बल्कि इतनी उंचाई पर आकर हांफने भी लगे थे, लेकिन जैसे ही अपने देश के सिपाहियों को ऐसे दुर्गम जगह पर भी मुस्तैद खड़े देखा, हमारी थकान भी कही उड़नछू हो गयी. सिर्फ अपने देश के ही नहीं वहां सीमा के उस पार चीन के भी सैनिक अपने देश की पहरेदारी कर रहे थे. उन्हें देख कर अहसास हुआ की असली ड्यूटी तो देश की सीमाओं पर खड़े ये सिपाही ही करते है.

इतनी ठण्ड और बर्फ बारी में भी कभी खुद के बारे में नहीं सोचते. इनके लिए तो सबसे पहले देश ही होता है, चाहे इनकी जान पर भी खतरा क्यों न आ जाये. इसलिए सबसे पहले वहां मौजूद ऐसे ही एक आर्मी मैन को हाथ मिला कर धन्यवाद कहा.

एक ओर भारत और दूसरी ओर चीन, बीच में लोहे का एक पतला तार. पर इस पतले तार में इतनी शक्ति की कोई इधर से उधर नहीं जा सकता. किसी में इतनी हिम्मत नहीं की इसे पार कर ले. वहां के प्राकृतिक सौन्दर्य को निहारने, इंडियन आर्मी को इतने नजदीक से सरहद की रक्षा करता देखने के बाद वापस हमलोग गंगटोक की ओर रवाना हुए.

          

रास्ते में लौटते वक़्त नाथूला दर्रे और जेलेप्ला दर्रे के बीच करीब 13000 फीट की उंचाई पर गाड़ी एक मंदिर के पास रुकी. जो एक भारतीय सिपाही की याद में बनाया गया था. इसके बारे में कहा जाता है कि पंजाब के कूका में जन्म लेने वाले हरभजन सिंह 1966 में इंडियन आर्मी के पंजाब रेजिमेंट में शामिल हुए.

दो साल के बाद 1968 में नाथूला दर्रा के समीप ही एक नदी में गिरने से उनकी मौत हो गयी. बाद में भारतीय सेना के कई सिपाहियों का कहना था कि उन्हें हरभजन ने चीनी से संबंधित कई अहम् सूचनाएं उन्हें दी. सिपाहियों का मानना है कि हरभजन की आत्मा भारत और चीन के बीच सूत्रधार का काम करती है. वो दोनों देश के आर्मी को समय समय पर सतर्क करती है. ताकि स्थिति तनावपूर्ण न हो. अब इनकी इस आस्था पर और लोगों को विश्वास हो या न हो पर चीन के आर्मी भी इस बात पर एकमत रखते है.

तभी तो, भारत और चीन के बीच होने वाले फ्लैग मीटिंग में भी हरभजन के लिए एक एक्स्ट्रा कुर्सी लगायी जाती है. लोगों में उनकी आस्था को देखते हुए 1987 में वहां उनके स्मृति में एक मंदिर का निर्माण किया गया, जो बाबा हरभजन मंदिर कहलाता है. आज भी यहां रात में इनके लिए बाकायदा बिस्तर तक लगायी जाती है, जिसपर सुबह सिलवटें पड़ी नजर आती है. सेना आज भी इनका रैंक और प्रमोशन दोनों दे रही है. यह जान कर अजीब लगा. दिमाग ने कहा देश में रक्षा से जुड़े पदों पर भी ऐसा अंधविश्वास? लेकिन दिल के अंदर इन बातों ने आस्था जगा दी. विश्वास और आस्था से जुड़े इन बातों पर ही चर्चा करते हमारी गाड़ी वहां से भी खुल गयी.

रास्ते भर मिलने वाले झरनों पर रुकते, मस्ती करते, बर्फीली हवाओं से लड़ते, कैमरे में जगह जगह की यादों को बटोरते शाम करीब छह बजे तक गंगटोक उतर गए. होटल में पहुंचते ही हमें गर्मागर्म चौमिन और चाय मिला. इस तरह खाते – पीते सात बज गए.

फिर हम सभी निकले गंगटोक की सैर करने. यहां के स्थानीय बाजार एम.जी. मार्ग की ओर. देख कर बहुत अच्छा लगा. शायद इस तरह का बाजार हमारे पटना में भी होता, तो कितना सुन्दर लगता. गंदगी से कोसों दूर. अगल – बगल कई दुकानें, रास्ते में बिछी टाइल्स, फूल – पौधों से भरा हुआ, उनके बीच फव्वारे से निकलता पानी. थूक और कचरे का कहीं नामोनिशान नही. बीच में राष्ट्रपिता महात्मा गांधी की मूर्ति भी लगी थी. यह स्थान सिर्फ पैदल घुमने वालों के लिए था, इसलिए यहां बाइक या साइकिल जैसी छोटी गाडियां भी नही चल रही थी. ये चीज़ ज्यादा अच्छी लगी. इन गाड़ियों के धुएं और आवाजों से दूर हमलोग बिलकुल स्वछंद होकर यहां घुमने और शॉपिंग का मजा ले रहे थे. बच्चे भी अपनी मनमर्जी से इधर – उधर धमाचौकड़ी मचाने में लगे थे.

ऐसे में अपने शहर के बाजारों की याद आई, जहां की तंग गली में भी बाइक सवार इतनी तेजी से लहरिया कट मारते निकल जाता है, की जब तक पीछे पलटे, वो गायब. इसलिए यहां जी भर सभी ने एंजॉय किया. मार्केटिंग करते, आइसक्रीम खाते समय का कुछ ख्याल ही नहीं रहा. मोबाइल निकाला तो उसमें दस बज चुके थे. वापस होटल पहुंच कर हमलोगों ने खाना खाया और चल पड़े सोने.

अगले दिन हमारी मंजिल जीरो पॉइंट की ओर थी. हालांकि बीच में हमारा पड़ाव लाचुंग था, जहां रात बिता कर अगले दिन सुबह सुबह बर्फ से भरे पहाड़ों पर चढ़ाई करनी थी. यहां के रास्ते भी काफी दुर्गम. कहीं पहाड़ों से पत्थर गिरते तो कहीं तेज धार में पानी के झरने. जब गाड़ियों के बिलकुल ऊपर गिरते तो सारे बच्चे खिड़की से हाथ निकाल कर उस बर्फीले धार की ठंडक को महसूस करते. ऊपर से हहराते हुए और पत्थरों से टकराते जब अपने अदम्य वेग से पानी नीचे गिरता है तो उसकी गर्जना बड़ी दूर तक सुनाई देती थी. डर के साथ साथ मजा भी आ रहा था. जिंदगी का एक नया अनुभव, नए प्रदेश में. प्रकृति को नजदीक से देखने का ये सुअवसर था.

गंगटोक से लाचुंग की दूरी करीब 125 किलोमीटर है, जिसे तय करते हुए बीच में भूख लगी तो एक जगह रुक कर चिकेन चावल पर टूट पड़े. पांच घंटे के सफ़र के बाद हमारी गाड़ी लाचुंग में जाकर रुकी. गाड़ी से  बाहर निकला तो चारों तरफ पहाड़. उन पर लगे पेड़ों की हरियाली बड़ी मनमोहक लग रही थी. यहां होटल के बाहर कुछ महिलाओं ने हमारा स्वागत किया और हमें हमारे कमरे तक ले गयी. लकड़ी के इस होटल को देख कर पहले तो अचरज हुआ, कमरे तक लकड़ी के थे.

पूछने पर बताया गया कि ठंडा और पहाड़ी प्रदेश होने के कारण यह बढ़िया होता है. होटल के सामने ही भारतीय सेना की छावनी थी. सड़क के ठीक उस पार उनकी कैंटीन, जहां मोमो खाने के लिए चार – पांच फौजी खड़े थे, जो बाहर जल रहे लकड़ी के टुकड़ों के ऊपर हाथ सेकते हुए आपस में बतिया रहे थे. उनसे बात करने पर पता चला की यहां डिफेंस के साथ साथ सिविलियन्स के लिए भी कैंटीन है, जहां कई चीज़े सस्ते दामों पर खरीद सकते है. फिर क्या था, मोमोज का आर्डर देकर चल दिए कैंटीन की ओर. पर वहां ज्यादा सामान नही था. एक फौजी ने कहा कि अभी एक दो दिन में और सामान आएगा. वहां ट्रैक सूट, बिस्किट्स, च्यवनप्राश आदि बेहद सस्ते मे खरीदते हुए वापस मोमोज खाने लौटे.

धीरे धीरे शाम हो रही थी और ठण्ड बढ़ती जा रही थी. इसलिए मोमोज के कई प्लेट लेकर होटल में पहुँचे और सबने यहां के फेमस फ़ूड कहे जाने वाले तीखे मोमोज का आनंद लिया. इसे खाते हुए अपने कॉलेज के दिनों की याद आ गयी. मीडिया की पढ़ाई करते हुए तब हम दोस्तों का ग्रुप बोरिंग रोड में मोमोज खाते हुए कितनी मस्ती किया करते थे. इसे खाने के लिए कभी प्रेम की जेब ढीली करते तो कभी आरती से बेमतलब की पार्टी ले लिया करते. खाते खाते जब राम जी ठाकुर की खिचाई करते तो उनकी इस बहस में हमलोगों के मोमोज नीचे गिर पड़ते. हंसते-हंसते सब पेट पकड़ लेते. डॉली की डोली इस वाक्य की रचना भी तो किसी को छेड़ने के उदेश्य से इसी मोमोज को खाते खाते हुई. तब की बात ही कुछ और थी. उन मीठी यादों के साथ तीखे मोमोज खाते खाते आंखें भर आई. दी ने समझा की ज्यादा तीखा है और पानी का ग्लास आगे बढ़ा दिया. अब उनलोगों से क्या कहता की ये आंसू तो उन यादों के है जो शायद ही अब नसीब हो. मोमोज ने उस वक़्त मुझे रुला ही दिया था, पर जैसे तैसे खुद को संभाला और बाहर निकल आया. होटल के ही एक दुकान में देखा एक महिला पैग बना रही है और हमारे गाड़ी का ड्राईवर पैग पर पैग मार रहा है. पता चला की ठंडा जगह होने के कारण यहां इन चीजों पर कम टैक्स लगता है. तभी तो यहां बोतलों की कीमत काफी कम थी. एक कप चाय जहां बीस रूपए के थे तो एक पैग तीस के. अब रात गहराती जा रही थी और हम सभी रूम में बैठ कर इन्हीं चीजों और यहां के बारे में गपशप करने में बिजी थे. दरअसल, लाचुंग देश के सिक्किम राज्य का एक क़स्बा है, जो चीन के तिब्बत से सटा नार्थ सिक्किम जिले में पड़ता है. यह दो नदियों लाचेन व लाचुंग के संगम पर बसा है. ये दोनों नदी ही आगे तीस्ता में मिलती है. लाचुंग 9,600 फुट की उंचाई पर है. होटल के पीछे एक नदी बह रही थी जिसके लहरों की आवाज़ हमारे कमरों तक आ रही थी. रात के शांत माहौल में लहरों से निकलता तेज आवाज़ ज्यादा भयानक लग रहा था.

अगले दिन हमलोग युमथांग घाटी और युमसंगडांग होते हुए जीरो पॉइंट पर जाने के लिए रवाना हुए. लाचुंग से युमथांग 24 किलोमीटर आगे है. उससे भी आगे युमसंगडांग है, उसके बाद जीरो पॉइंट मिलता है, जो 14,300 फीट की उंचाई पर है. जीरो पॉइंट पर ही यहां रोड समाप्त हो जाती है. लाचुंग से निकलते वक़्त ही नाथूला की तरह यहां भी हमलोग कोट, बूट वगैरह धारण कर बर्फीली चोटी पर चढ़ने के लिए पूरी तरह तैयार थे. पर ठण्ड तब भी लग रही थी. रास्ते में चीड़ के कई पेड़ मिले. जिनके डाल के किनारे पीले व लाल रंग के नन्हे पत्ते पनप रहे थे. दूर से देखने में बड़े सुन्दर लग रहे थे. ऐसा लग रहा था मानों क्रिसमस का दिन आ गया हो. सोचने लगा कि जिस पौधे को अपने घर के टैरेस की शोभा बढ़ाने के लिए नर्सरी से दो सौ रूपए में ख़रीदा था, यहां तो उसी का जंगल है. अपने यहां तो गमले में होने की वजह से छोटा पौधा है, पर यहां तो कितने बड़े बड़े और विशाल पेड़ है इसके.

बाद में जब और ऊपर आये तो पेड़ों के जंगल समाप्त हो चुके थे और छोटी छोटी झाडियां मिलने लगी. उससे और ऊपर बढे तो कई फूलों के पौधे नजर आने लगे. दूर से पूरी घाटी गुलाबी दिखने लगी. इन फूलों के कारण ही युमथांग घाटी को फूलों की घाटी और पूर्व का स्विट्ज़रलैंड भी कहते है. इसके पास ही गर्म जल का झरना है. जैसे हमारे बिहार के राजगीर में है. यहां के पानी में सल्फर घुला है, जिसमे नहाने से स्किन सम्बन्धी बीमारियां दूर होती है. इसी तरह अंत में जीरो पॉइंट पहुंचे. खुद पर विश्वास नहीं हो रहा था कि इतनी उंचाई पर खड़े है.

चारों तरफ बर्फ की सफ़ेद चादर, आकाश बिलकुल नीला और नीचे उड़ान भरते बादल. पर यहां ज्यादा दौड़ नही सकता और ना ही चिल्ला सकता क्योंकि इतने ऊपर ऑक्सीजन भी शरीर को पर्याप्त नहीं मिल पाता. सामने बर्फ पर पहले से आये कई टूरिस्ट इसका मजा ले रहे थे. चूंकि ठंड ज्यादा थी और लाचुंग से हमलोग बिना कुछ खाए निकले थे तो सबसे पहले वहां लगे एक अस्थायी दूकान में बैठे.

यहां देखा तो वाटर बोतल, कोल्ड ड्रिंक और चाय के साथ रम, बियर, व्हिस्की, बिजी बी सब एक साथ रखा हुआ था. दुकान चलाने वाली वो लड़की भी जल्दी जल्दी सबकी मांग पूरी कर रही थी. कुछ देर वहीँ बैठ कर मैगी, बटर – ब्रेड और गर्मागर्म चाय पीने के बाद हमलोग भी चल दिए बर्फ की ओर. करीब घंटे भर हमलोगों ने भी वहां खूब उछल कूद मचाया. कभी ऊपर जाकर बर्फ पर गिरते और फिसलते हुए नीचे आ जाते. तो कभी बर्फ का गोला बना कर एक दुसरे पर बड़े जोर से मारते. ऐसा करते हुए बड़ी जल्दी थक भी रहे थे और साँस फूल भी रही थी, फिर भी परवाह किसे. ऐसा मस्ती भरा मौका आखिर बार – बार कहां मिलता है. सबने अपने अपने अंदाज और स्टाइल में अपनी फोटो खिचवाई. वहां की खूबसूरती देखते बन रही थी. पर अब हमें वापस गंगटोक भी लौटना था. इसलिए वहां बर्फीली हवाओं के बीच बर्फ के मैदान में अपने निशां छोड़ लाचुंग लौट चले.

लाचुंग में खाना खाया और अपने सामान पैक कर यहां से भी होटल की उन लड़कियों और महिलाओं को बाय बाय करते विदा हुए, जिन्होंने हमारे खाने पीने से लेकर हर चीज़ का खास ख्याल रखा और यहां के जगहों के बारे में भी जानकारी दी थी.

रात में गंगटोक उतरे और फिर अपने सामानों की पैकिंग में व्यस्त हो गये. अगले दिन ही हमें वापस पटना जो लौटना था. वो रात सिक्किम में हमलोगों की आखिरी रात थी. बिस्तर पर गया तो जल्दी नींद भी नही आई.  शायद इन थोड़े दिनों में ही कुछ भावनात्मक लगाव सा हो गया हो इस शहर के साथ. अगली सुबह जब गाड़ी में बैठ कर यहां से जाने लगा तो सड़क किनारे लगे वो बड़े बड़े पेड़ जिनसे कुछ दिनों की जान पहचान हुई थी अपनी डालियां हिला हिला कर मानों फिर से आने का निमंत्रण दे रहे थे. उन्हें देखते हुए इस दिल से भी एक आवाज़ निकली की जिंदगी में मौका मिला तो मुलाकात फिर होगी इस शहर से. तब तक के लिए इन चंद दिनों के यादों की गठरी ही अपने साथ ले कर पटना की ओर लौट चले.

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