राउरकेला एक ऐसा शहर जहां हर सुबह सूर्य अंगराई लेता हुआ पहाड़ों की ओट से निकलता है, दिन भर झरनों, नदियों की जलधाराओं के बीच चमकता-दमकता है, और फिर शाम होते ही जा छुपता है वापस उन्ही पहाड़ियों के पीछे.

प्रकृति की खूबसूरती यहां चारों ओर बिखरी पड़ी है. राउरकेला पहाड़ियों और नदियों के बीच बसा है. ग्रीन सिटी होने के साथ साथ यह शहर इस्पात नगरी भी कहलाता है, हर तरफ हरियाली, ऊँचे पहाड़, जंगल के बीच यहां बड़े स्टील प्लांट भी हैं जिनकी चिमनियों से हर वक़्त धुंआ निकलता रहता है. हालाँकि इन निकलते धुओं से ही तो यहां के लोगों की साँसे जिन्दा है. उन्हें रोजगार मिल रहा जिसके कारण उनकी जिंदगी में रफ़्तार भरा है…

ऐसा है ओड़िसा का तीसरा सबसे बड़ा शहर राउरकेला. पर मैं भी तब इसके बारे में इतना कहां जानता था. बस सिर्फ यही पता था की सबसे बड़े स्टील प्लांटों में से एक स्टील अथॉरिटी ऑफ़ इंडिया लिमिटेड (सेल) यही है. जिसे राउरकेला स्टील प्लांट भी कहते है. ये और बात है कि यहां आने के बाद इसके शार्ट नेम ‘आरएसपी’ से रूबरू हुआ.

दरअसल एक जरुरी काम के सिलसिले में मेरा यहां आना हुआ. ओड़िसा की ओर ये मेरी पहली यात्रा थी, इसलिए खूब उत्साहित था. तभी तो ठंड की परवाह न करते हुए 26 जनवरी की सुबह 5 बजे ही ट्रेन पकड़ने के लिए घर से निकल पड़ा पटना जंक्शन की ओर. सफ़र वाया रांची होते हुए पटना से राउरकेला का था. स्टेशन पहुंचा तो देखा रांची जनशताब्दी लगी हुई थी. मेरी सीट डीआर 1 में थी. सोचा ये बोगी सबसे आगे होगी, इसलिए इंजन के पास चला आया. पर ये क्या यहां तो डीआर 2 बोगी लगी थी. मतलब अब सबसे पीछे जाना होगा. बोगी ट्रेन के सबसे पिछले हिस्से में थी. हालाँकि गया में इंजन इस बोगी के आगे आकर लग जाता है, जिस कारण यहां से ये बोगी सबसे आगे हो जाती है. खैर मैं अपनी आरक्षित सीट पर आकर बैठ गया. इस डिब्बे में 1 से 81 नंबर तक ही कुर्सी लगी थी.

लेकिन एक महाशय को रेलवे की गलती से इसी डिब्बे में 82 नंबर का सीट आवंटित हो गया था, वो बेचारे अपना नंबर खोजने लगे, नही मिला तो उन्हें फिर लम्बी दूरी तय कर डीआर 2 में जाना पड़ा. ठीक 6 बजे ट्रेन खुल गयी. कुछ देर बाद सूर्य की किरणें खिड़की से होते हुए अन्दर आने लगी. फिर क्या था शुरू हो गयी मेरी फोटोग्राफी.

पटना से रांची का सफ़र तय करने में 8 घंटे लगे. करीब 2 बजे मैं रांची स्टेशन उतरा. यहां से राउरकेला के लिए अगली ट्रेन अल्लेप्पी एक्सप्रेस 3:०5 बजे खुली. रांची से राउरकेला के बीच कई छोटे छोटे स्टेशन है. जहां अधिकतर आदिवासी लोग ही नजर आये. ट्रेनों में भी आदिवासी महिलाएं टोकरियों में अमरुद, पपीता बेच रही थी. मैं खिड़की के बाहर प्रकृति का अप्रतिम सौन्दर्य निहार रहा था.

ट्रेन कभी पहाड़ियों के बीच से गोल गुजरती तो कभी मैदानी रास्ते के चक्कर लगाती हुई आगे बढ़ रही थी. रांची से राउरकेला के बीच साढ़े तीन घंटे का यह सफ़र कैसे गुजर गया पता भी नहीं चला. शाम साढ़े 6 बजे मैं राउरकेला स्टेशन उतरा, देखा सुमन पहले से ही स्टेशन पर मौजूद था.

राउरकेला भारत के ओड़िसा राज्य के उतर पचिमी किनारे पर स्थित एक शहर है जो सुंदरगढ़ जिला में आता है. यह शहर दिखने में जितना आधुनिक है, उतनी ही अपनी जड़ों से भी जुडा है. यहां बड़े बड़े कल-कारखानों के बीच प्रकृति का अस्तित्व भी कायम है. लोगों के आधुनिक रहन सहन के बीच जनजातीय जीवन शैली भी फलफूल रही है. चारों और फैली पहाड़ियों की लम्बी श्रृंखला, नदियाँ, झरने, पार्क, म्यूजियम और मंदिर सहित यहां घुमने लायक कई बेहतरीन जगहें हैं. कुछ तो इतने खास हैं की ये आपको बार बार राउरकेला आने को भी मजबूर कर सकते हैं.

अगले दिन सुमन ने अपनी बाइक से पूरे राउरकेला का भ्रमण कराया. यहां की रिंगरोड से होते हुए अलग अलग चौक और सेक्टर से गुजरते हुए राउरकेला से धीरे धीरे मेरी जान पहचान बढ़ रही थी.   23 किलोमीटर लम्बी रिंग रोड यहां के 19 सेक्टरों के साथ पूरे शहर को जोड़ती है. शहर की सड़कों पर घुमक्कड़ी और फोटोग्राफी करते हुए सबसे पहले हम पहुंचे हिल टॉप. वह जगह जहां से पूरा शहर दिखता है. यहां बाइक से ही हमलोग दुर्गापुर पहाड़ी की उचाई पर पहुंचे. वाकई यहां से राउरकेला का अद्भुत नजारा दिख रहा था. स्टील प्लांट से लेकर प्रसिद्ध बीजू पटनायक हाकी स्टेडियम तक. यह जगह शहर के युवाओं के लिए मस्ती का ठिकाना है. हिल टॉप के ऊपर एक छोटी सी मंदिर भी है.

साथ ही यहां एफएम रेडियो स्टेशन का एक टावर भी लगा है. हमलोगों ने कुछ देर यहां वक़्त गुजारा. हरी भरी वादियों और ठंडी हवाओं के बीच ये जगह किसी जन्नत से कम नहीं लगी.

इसी पहाड़ी के दूसरी तरफ माँ वैष्णो देवी का मंदिर है. ठीक वैसी ही जैसी जम्मू-कश्मीर में है. हिल टॉप से उतर कर हम इसके दुसरे छोर गोपबंधूपल्ली पहुंचे, यहां से दुर्गापुर पहाड़ी की हमने अपनी चढ़ाई शुरू की. ऊपर पहाड़ पर बने इस मंदिर तक जाने के लिए सीढियां बनी हुई है. हर सीढियों के बीच दानदाताओं का नाम लिखा मार्बल का चोकौर टाइल्स लगा है.

जगह जगह थक कर बैठने के लिए कुर्सियां और प्यास बुझाने के लिए नल लगे है. 600 से भी ज्यादा सीढियां चढ़ कर हमलोग ऊपर मंदिर पहुंचे. पर कहते है न, जब माँ की मर्जी होती है तभी वो द्वार पर आने का निमंत्रण देती है. ऊपर आया तो देखा गुफा का द्वार ही बंद है. दरअसल मंदिर सुबह 6 बजे से सवा 12 बजे दोपहर तक ही खुला रहता है. उसके बाद फिर दुबारा शाम 4 बजे से 8 बजे तक ही माँ के दर्शन हो सकते है.

हनुमान वाटिका

इस मंदिर का निर्माण 2003 में हुआ था. साल 2000 में हिल टॉप पर माँ लक्ष्मी, माँ काली और माँ सरस्वती की मूर्तियाँ मिली थी. जिसे इस मंदिर में स्थापित किया गया. खैर त्रिशक्ति के दर्शन से तो वंचित रहा, पर फोटोग्राफी अपनी नॉन-स्टॉप जारी रही.

इसके बाद हनुमान वाटिका की ओर गए. यहां हनुमान जी की बड़ी सी प्रतिमा है जो बाहर सड़क से ही नजर आ रही थी. हनुमान वाटिका का पूरा परिसर 13 एकड़ भू भाग में फैला है. जहां अलग अलग देवी-देवताओं के दर्जनों मंदिर है, और सबकी वास्तुशिल्पी बनावट देखने योग्य. हनुमान वाटिका में जो सबसे ज्यादा आकर्षित करता है वह है 74 फीट 9 इंच ऊँचाई की बजरंगबली की प्रतिमा. इस प्रतिमा को आंध्र प्रदेश के शिल्पकार टोगु लक्ष्मण स्वामी ने बनाया था. इसे बनाने में करीब दो साल का समय लगा. 23 फरवरी 1994 को ओड़िसा के तत्कालीन मुख्यमंत्री बीजू पटनायक ने इस प्रतिमा का उद्घाटन किया था. उस वक़्त मूर्ति के ऊपर माला पहनाने के लिए उन्हें क्रेन से ऊपर ले जाया गया था. जमीन पर अपनी गदा टिकाए खड़े बजरंगबली की ये प्रतिमा देखने में बेहद सुन्दर लगती है. यहां हनुमान जी के शरीर पर मधुमक्खियों ने भी पनाह ले रखा है. क्योंकि जब हमने प्रतिमा के पीछे देखा तो मधुमक्खियों के कई छते नजर आये.

राउरकेला में वेदव्यास नामक जगह  भी काफी पवित्र मानी जाती है. यह जगह अपने एतिहासिक कारणों को लेकर प्रसिद्ध है. यहां कोयल, सरस्वती और शंख ये तीन नदियाँ मिलती है, जिसे त्रिवेणी संगम कहा जाता है. यहां से फिर तीनों नदियाँ एक होकर ब्राह्मणी नदी के रूप में बहती है. कहा जाता है यही वो जगह है जहां वेद व्यास जी ने महाभारत की रचना की थी. हालाँकि इस बात में कितनी सच्चाई है, नहीं पता. क्योंकि देश के किस हिस्से में महाभारत लिखी गयी, इसे लेकर लोगों के विचार मेल नहीं खाते.

राउरकेला में घुमने लायक कई और भी जगहें है, पर समय की कमी के कारण हम वहां नहीं जा सके. और फिर वापस पटना भी लौटना था. इसलिए शहर की पूरी घुमक्कड़ी तो नहीं हो सकी लेकिन जाते जाते अगली बार राउरकेला से दुबारा मिलने का वादा जरुर किया.  देखते है ये वादा कब पूरा होता है…

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