बड़ा उत्साहित था मैं, जब पता चला कि चैनल के काम से बेगूसराय जाना है। अजनबी शहर में दो दिन बिताना।
यही तो यात्रा है। सफलता के छोटे-छोटे पर अहम पड़ाव हैं जिन्हें पूरा करना है।
यूं तो घूमने के उद्देश्य से देश के कई राज्यों की यात्राएं की पर काम के सिलसिले से कहीं जाने का ये मेरा पहला अनुभव रहा।
सोचा काम के साथ-साथ अपनी घुमक्कड़ी के लिए भी समय निकाल लूंगा। यहाँ
ख़ूबसूरत काबर झील पक्षी अभयारण्य से लेकर नौलखा मंदिर, जयमंगला गढ़ मंदिर आदि कई प्राचीन मंदिर भी हैं। फिर शहर के इतिहास को जानने के लिए एक चक्कर बेगूसराय म्यूजियम का भी लगा लूँगा।
सुबह पाँच बजे ही निकल पड़ा इस सफ़र पर। राजेंद्र नगर टर्मिनल से सहरसा इंटरसिटी ट्रेन में बैठते ही मैं तो ट्रेन की खिड़की से गुजरते ख़ूबसूरत नजारों को देखने में खो गया। कब पहुंच गए पता ही न चला।
बेगूसराय: बिहार का एक खूबसूरत शहर।
इस शहर का नाम दो शब्दों से मिलकर बना है एक बेगम और दूसरा सराय। सराय यानी ठहरने या विश्राम करने के लिए बनाया गया स्थान। कहते हैं कि भागलपुर की रानी यहां गंगा के तट पर पूजा-अनुष्ठान करने के लिए आया करती थीं। इसी वजह से इस शहर को बेगूसराय कहा जाने लगा। राष्ट्रकवि रामधारी सिंह दिनकर की जन्मभूमि होने के नाते इस शहर का जुड़ाव साहित्य से भी रहा है।
बेगूसराय की धरती पर कदम रखते ही शहर के प्रति अपनेपन का सा अहसास होने लगा था। संकरी सडकें, बाजार, भीड़। न जाने क्यों इस शहर को देख कर अपने पुराने शहर बिहार शरीफ की याद ताजा हो गयी। बिलकुल ऐसा ही तो था वह शहर जिसकी गोद में खेला; बचपन की देहरी पार कर जिंदगी जवां हुई। कैसे भुला दूं उसे, जिसका जिक्र करते ही न जाने कितनी यादें गलबहियाँ करने को बेचैन हो उठती हैं। वक़्त एक सा कहाँ रहता है?
छूट गया वह शहर और अजनबी हो गए वो लोग, जो कभी साथ हुआ करते थे।
शहर छोड़ते वक़्त उससे भी तो दूरियाँ बना कर आया था। कितनी पनीली हो उठी थी दोनों की आँखें।
आँसुओं की झिलमिलाहट में एक-दूसरे की सूरत भी धुंधली नजर आ रही थी। कॉलेज का वो आखिरी दिन था। सभी दोस्त भविष्य में फिर मिलने का वादा कर रहे थे, और एक हम थे जो एक-दूसरे से फिर कभी न मिलने की कसमें खा रहे थे। एक-दूसरे को विदा कर रहे थे। उनके सपनों के साथ।
उसने बैंकर बनने का ख्वाब देखा था। और मेरा रुझान जर्नलिज्म की ओर था। एक-दूसरे के सपनों को मंजिल मिल जाए ईश्वर से हमारी यही प्रार्थना थी। अपने रिश्ते को कोई नाम देने से बेहतर दूर हो जाना ही हमें सही लगा। जिंदगी में मुकाम पाने के लिए हमें यह कठोर फैसला लेना पड़ा। कितना बोझिल पल था वह। सालों का साथ यूँ एक पल में बिखर रहा था। लेकिन अब हम फिर कभी नहीं मिलेंगे, कभी एक-दूसरे के सामने नहीं आयेंगे।
एक-दूसरे की नजरों में झांकते हुए, हाथों में हाथ पकड़ कर यही प्रण तो हमने लिया था। फिर कैसे मैं उस प्रण को तोड़ देता। सालों की वो प्रतिज्ञा, वो तपस्या भंग नहीं हो जाती।
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दरअसल अपने एक सहकर्मी के साथ बेगूसराय में एक बैंक में जाना हुआ। अन्दर ग्राहकों की भीड़ जमा थी। सहकर्मी महोदय तो अपने काम में लग गए, और मैं अकेला खाली कुर्सी देख कर बैठ गया। सामने वाले काउंटर पर लोगों की कतारें लगी थी। उस तरफ कोई लड़की बैठी थी। पहले तो ध्यान ही नहीं दिया, पर जब एक नजर उसके चेहरे पर पड़ी, मैं अचानक हड़बड़ा गया। ये प्रिया ही है न! उसे देखते ही एक के बाद एक अतीत के सारे पन्ने खुलने लगे।
जिंदगी ने फिर हमें आमने-सामने खड़ा कर दिया था। पर हमें सामने नहीं आना। आखिर यह फैसला भी तो हमारा ही था।
कभी सोचा न था वक़्त की ढलान पर उतरते-उतरते जिंदगी हमें इस मोड़ पर खड़ा कर देगी। इतने साल बाद उसे देखना; देख कर भी अनदेखा करना। कितना मुश्किल था वो सब कुछ। दिल तो उससे बातें करने को बेचैन हुआ जा रहा था पर मज़बूरी थी। उससे किया वादा जो निभाना था।
मैं अपने आप से बातें करने लगा। वक़्त के साथ उसमें भी कई बदलाव आ गए थे। वो चश्मा भी पहनने लगी। पर बालों का स्टाइल उसका अब भी वही था। ये नहीं बदलने वाला। सोचते-सोचते उसे और नजदीक से देखने की लालसा हुई। मैं उठ खड़ा हुआ, वो ठीक मेरे सामने बैठी थी, काम में व्यस्त। आखिर उसके सपने सच हो ही गए।
पर ये सपने तो उसकी माँ ने देखे थे। उस दिन वो कितना रोई थी, अस्पताल में उसके साथ मैं भी था। मेरे सामने ही उस माँ ने जाते-जाते अपने अंतिम समय में बेटी को अपना यह सपना सौंपा था। बैंक अधिकारी बनने का सपना। और उसने भी माँ की उस अंतिम इच्छा को पूरा करने का दृढ संकल्प लिया था।
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आज उसे बैंक अधिकारी के रूप में देख कर बड़ा अच्छा लगा। बैंक में लोगों की भीड़ अब कम होने लगी थी। अचानक उसने ऊपर देखा, मैंने झट से अपनी नजरें फेर ली। कहीं उसने मुझे देख लिया तो। नहीं! नहीं! ऐसा नहीं हो सकता। मैं वहां से कुछ दूर खड़ा हो गया। वहीं से चोरी-चोरी उसे काम करते देखने लगा।
सालों बाद उसे देख रहा था। वो भी अजनबी बनकर। कितना दुखदायी होता है न, कभी जिसके साथ जी भर कर बातें करता था, आज बिना कुछ बोले उसे चुपके से देखने को मजबूर हूँ। मन व्याकुल हो उठा था। एक तो इतने सालों बाद उसे देखा, और फिर ये पल हमेशा के लिए खो जायेंगे जिंदगी से। अब न जाने कब मौका मिले, शायद ये हमारी अंतिम मुलाकात हो। कौन जानता है। भले अब हम न मिले, पर मैं खुश था। निश्चिन्त था। उसने अपनी माँ से किया वादा निभाया। वैसे वादा तो मैंने भी निभाया। कभी नहीं मिलने का वादा।
बैंक से बाहर निकल रहा हूँ। पर पलट कर नहीं देखूंगा। बड़ी मुश्किल से ख़ुद को क़ाबू में रखा। जाते-जाते कमजोर नहीं होना चाहता। निकलते-निकलते फिर सामने सब कुछ धुंधला सा नजर आने लगा…।
बेगूसराय शायद अगली ही बार घूम पाऊंगा।
कहाँ मालूम था कि यह यात्रा तो मेरे लिए महज माध्यम भर थी उसे देखने को। इसके जरिये ईश्वर ने तो कुछ और ही लिखा था। आखिर कितनी छोटी सी है यह दुनिया। रास्ते से जुदा हुए लोग कभी न कभी किसी मोड़ पर मिल ही जाते हैं।

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