पिछले साल गर्मी के इस मौसम में सिक्किम की सैर करने निकला था, तो इस साल भी कहां चला जाये इसकी प्लानिंग हो रही थी. तभी अचानक गुजरात घूमने का ख्याल आया. टीवी पर कई बार अमिताभ बच्चन को गुजरात टूरिज्म के विज्ञापन में कहते सुना और देखा था, जिसमें वो देशवासियों से कुछ दिन गुजरात में बिताने की गुजारिश करते रहते हैं.

तो फिर क्या था दीदी और जीजू के साथ मैं भी उनके गुजरात यात्रा में शामिल हो गया. जून का पूरा आधा महीना हमें गुजरात के अलग अलग शहरों, वहां के दर्शनीय स्थलों, मंदिरों और समुन्द्र के किनारों पर बिताना था. मन तो बस घुमने की बात पर ही खूब कुलांचे भर रहा था. सोमनाथ,द्वारका, अक्षरधाम आदि कई मंदिरों से रूबरू जो होना था. जब भी मौका मिलता बस नेट पर गुजरात के बारे में ही जानकारियां बटोरने में लग जाता. वहां घुमने लायक जगह कौन सी है, बीच कैसा है, वहां के ऐतिहासिक मंदिरों के इतिहास से लेकर वहां के रहन-सहन, खाने-पीने के तौर-तरीकों पर खूब रिसर्च किया करता था. यहां तक की फैमिली,फ्रेंड्स जिन्होंने गुजरात घूमा हो या वहां रह रहे हो उनसे भी काफी जानकारी इकठ्ठी की. इसी क्रम में जब जीजू ने वांकानेर में एसीसी सीमेंट में पोस्टेड मौसा जी से इस ट्रिप की चर्चा की तो उन्होंने तो बाकायदा एक्सेल शीट में मिनट टू मिनट प्लानिंग ही मेल कर दिया. जिसमें घुमने लायक सारी जगहों की डिटेल्स थी.

सफ़र के दौरान यह हमारे काफी काम आई. यूं तो हमें पहले अहमदाबाद जाना था, लेकिन ब्रेक जर्नी करते हुए हमें पहले देश की राजधानी दिल्ली में एक रात रुकना था. तो पटना से दिल्ली का पहला पड़ाव हमारा एक जून से शुरू हुआ.

पटना जंक्शन से शाम पांच बजे आनंद विहार टर्मिनल के लिए खुलने वाली विक्रमशीला एक्सप्रेस में हमारा रिजर्वेशन था. इसलिए अपने शहर की अस्त-व्यस्त ट्रैफिक व्यवस्था को ध्यान में रखते हुए हमलोग दो घंटा पहले ही घर से निकल गए. स्टेशन पहुँचे तो पता चला अब ट्रेन एक घंटे लेट थी. खैर रेलवे ओवर ब्रिज पर ही हमलोगों ने अपना डेरा डाला और ट्रेन का इंतजार करने लगे. करीब छह बजे ट्रेन आई और फिर उसमें सवार होकर हम सभी दिल्ली की ओर कूच कर गए. रास्ते में पढ़ने के लिए मैंने एक नया नॉवेल रखा था, वर्ल्ड वाइड वेब ट्रैप. पूरा तो नहीं पढ़ पाया लेकिन जितना पढ़ा, उसके अनुसार तो यह काफी इंटरेस्टिंग लगी. इस नॉवेल के राइटर अमित चौधरी जी से यह मुझे मिली थी. वाकई सर, मानना पड़ेगा आपको और आपकी दूरदर्शिता को. कितना आगे का सोचते है. आप और इस नॉवेल की को-राइटर पायल बांगर ने मिलकर ऐसा तिलिस्म बाँधा है कि पढ़ते पढ़ते कई दफा लगा कि मैं भी 2049 में पहुंच गया हूं. वैसे कोशिश कर रहा हूं कि जितनी जल्दी हो सके इसे पढ़ लूं. इसकी स्टोरी, कैरेक्टर, सब के सब लाजवाब है.

उपर सरपट भागती जिंदगी तो नीचे सरकता जीवन

हां तो ऐसे ही पढ़ते, खाते-पीते, सब के साथ हंसी-मजाक करते अगले दिन दोपहर के दो बजे हमलोग दिल्ली के आनंद विहार टर्मिनल पहुंच गए. वहां से अब हमें द्वारका मोड़ जाना था. उसके लिए ब्लू लाइन मेट्रो हमने पकड़ा. फिर कड़कडूमा, प्रीत विहार, निर्माण विहार, लक्ष्मी नगर, प्रगति मैदान, करोलबाग, मोती नगर, राजौरी गार्डन आदि कई मेट्रो स्टेशन पार करते हुए द्वारका मोड़ उतर गए. यहां एक रात गुजारने के बाद अगले दिन हमें अहमदाबाद के लिए फिर रवाना होना था.

शाम 3:20 में दिल्ली कैंट से हमें आश्रम एक्सप्रेस में चढ़ना था. और इधर दोपहर से ही दिल्ली में बारिश भी शुरू हो गयी थी. इसलिए सबने कहा कि पहले ही चलना ठीक होगा तो जैसे ही करीब दो बजे बारिश रुकी, हमलोग स्टेशन की ओर  निकल पड़े. वहां समय से पहले हमलोग पहुंच गए थे तो समय काटने के लिए स्टेशन परिसर के चक्कर लगाया और इस बीच कैमरे का साथ तो था ही. सो वहां भी सेल्फी जिंदाबाद रही.

यह हमारे यात्रा का पहला पड़ाव था. अगले पोस्ट में आपको ले चलेंगे अहमदाबाद और वहां के अक्षरधाम मंदिर सहित कई और जगह. तब तक के लिए Keep Visiting On Hindi Travel Blog.

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