…अब क्योंकि हमलोग नागपुर में थे और बिहार से लम्बी दुरी तय कर पहुंचे थे तो वहां घूमना तो श्योर था.

तो सबसे पहले हम नागपुर के साईं मंदिर पहुंचे.देखने में भव्य और सुन्दर लग रहा था.वहां साईं भगवान् के मूर्ति के अलावे कई फोटो भी लगे थे.जिनका हम सभी ने बारी बारी से दर्शन भी किया.मूर्ति के पास फोटो लेने की मनाही थी इसलिए हमसभी ने बाहर ही कई फोटो खिचवायें और अपने इस मोमेंट्स को मेमोरेबल बनाया.

अगले दिन हमारी टूर कुछ दूर तक जाने वाली थी,इसलिए हमसभी थोडा पहले ही घर से निकल गये.

तीन स्थानों रामटेक,खिंडसी और रामधाम को देखने हमारी गाड़ी चल पड़ी. हालाँकि गर्मी वहां पटना से भी कही अधिक थी पर टवेरा के अन्दर की एसी ने हमे रास्ते भर की उन चिलचिलाती धुप और गर्म हवा के थपेड़ो से बचा कर रखा.

रास्ते में यहाँ की सड़कों को देख काफी अच्छा लगा साथ ही नागपुर के अनुशासित लोगों ने भी मन मोह लिया,अच्छा इस मायने में की यहाँ सबसे पहले तो पटना की तरह सड़क के हर चौराहों पर हाथों को लेफ्ट राईट करते ट्रैफिक पुलिस के दर्शन नही हुए,क्योंकि यहाँ हर जगह इलेक्ट्रोनिक लाइट सिग्नल लगे थे जो पूरी तरह से अपना काम कर रहे थे,और यह देख अच्छा लगा की यहाँ की पब्लिक भी पूरी ईमानदारी से उन सिग्नल के अनुसार ही चल भी रहे है. कहीं कोई हड़बड़ी या ट्रैफिक जाम की समस्या नही.बिलकुल स्मूथ और रश का तो सवाल ही नही.

शहर से जब बाहर निकले और हाई वे पर उतरे त्तो यहाँ के दृश्य भी काफी लुभावने लगे. गाड़ी की रफ़्तार से कही ज्यादा हमारी कल्पनाएँ आगे आगे भाग रही थी. आखिर मन बेताब हो भी क्यों न,क्योंकि हम अब उस राह के राही हो चले थे जो देश की सबसे लम्बी सड़क कही जाती है. पहले तो विश्वास ही नही हुआ,बचपन में अपने सामान्य ज्ञान के टीचर को सुनाने के लिए जिस हाई वे के बारे में जोर जोर से रटता था आज उसी राष्ट्रीय राजमार्ग 7 से गुजर रहा था.वही एन.एच 7 जो वाराणसी से कन्याकुमारी तक जाती है और 2,369 कि.मी. की लम्बी दुरी तय करती है.

साथ में अंकल,आंटी,दीदी,जीजू और उनके बच्चे सब भी थे जिनके साथ हसी-मजाक करते कब हम रामटेक पहुँच गये, पता भी नही चला.

ऊँचे पहाड़ के ऊपर बना यह मंदिर देखने में काफी आकर्षक लगता है.इसकी पुरानी स्थापत्य कला देखने योग्य है.पुराने समय में रामटेक को रामगिरी कहा जाता था.यह प्राचीन काल से ही धर्म स्थल रहा है.

धार्मिक मान्यताओं के अनुसार अपने वनवास के वक़्त प्रभु रामचंद्र भ्रमण करते हुए रामगिरी आये,यहीं अगस्ति मुनि का आश्रम था.इनसे मिलने के दौरान ही क्रूर और मायावी राक्षसों द्वारा फेंकी गयी तपस्वी लोगों की हड्डियां देख कर राम जी को बहुत दुःख हुआ और भगवन राम ने यहीं प्रतिज्ञा ली की इस पृथ्वी से राक्षसों का वंश मिटा दूंगा. टेक का अर्थ भी प्रतिज्ञा ही होता है,इसलिए इस जगह को रामटेक कहा जाने लगा.

कहते हैं कि महाकवि कालीदास ने अपनी जगतप्रसिद्ध काव्य मेघदूत की रचना यहीं की थी.साथ ही,बोधिसत्व नागार्जुन का यहाँ कुछ समय निवास रहा,ऐसा लोगों का मानना है.

यहाँ आते ही सबसे पहले हमारा स्वागत यहाँ रहने वाले बंदरो ने किया. हमें बताया गया की जो भी खाने लायक चीज़े है सभी इन बंदरो से छिपा कर बैग्स में रख ले वर्ना इनकी दबंगई यहाँ इतनी चलती है की एक बार अगर इनकी नजर में वो चीज़ आ गया तो फिर ये सभी टूट पड़ते है और बैग्स से निकाल कर ही दम लेते है.

रामटेक शहर में कई प्राचीन मंदिर है – श्री विट्टल मंदिर,लक्ष्मी नारायण मंदिर,श्री शीतला माता मंदिर,श्री दक्षिणामूर्ति मंदिर,नारायण टेकडी,श्री अट्ठारह भुजा गणपति मंदिर इत्यादि. ये सभी मंदिर ऐतिहासिक है.

महामुनि अगस्ती आश्रम – रामटेक मंदिर के अन्दर और भैरव महाद्वार के पास ‘महामुनि अगस्ती आश्रम’ है.यहीं प्राचीन अखंड धुनी और राधा – कृष्ण की सुन्दर मूर्ति भी है.आज भी यहाँ हजारों सालों से सदैव गुप्त अग्नि कुंड और उसमें अग्नि प्रज्वलित है.यहाँ श्री राधा जी की सफ़ेद संगमरमर की बनी मूर्ति काफी मन मोहक लगती है.तो वहीँ ठाकुर जी की काले चमकीले संगमरमर वाली मूर्ति की शोभा भी देखते बनती है.

मंदिर के अन्दर कदम रखते ही एक सकारात्मक आभास होने लगता है,मन किसी दैवीय ऊर्जा से भाव विभोर सा झुमने लगता है.हमलोगों को वहां इतनी मानसिक शान्ति का अनुभव हो रहा था की दिल अब कहीं जाने का नाम ही नही ले रहा था.ऐसा लग रहा था जैसे सब कुछ छोड़ बस अपलक राधा – कृष्ण की उन मूर्तियों को ही निहारते रहे.

महावराह मंदिर – रामटेक मंदिर के पास ही भगवन वराह की चार पैरों वाली मूर्ति स्थापित है.देखने में यह मूर्ति करीब 5 से 6 फीट ऊँची और उतनी ही लम्बी दिखती है.इस मूर्ति के सामने के पैरों के बीच पृथ्वी दिखाई गयी है.वहीँ इनके चार पैरों के बीच संकरी जगह है.

        

कहा जाता है की जो भी इस मूर्ति के पेट के नीचे से उन संकुचित जगह को पार कर जाता है वह बड़ा पुण्य वाला इंसान होता है.हालाँकि हम में से किसी ने भी इसे नही किया,जिसका अफ़सोस सबको है.और हो भी क्यों न,इस कलयुग में भला कौन दो चार पुण्य नही कमाना चाहता. दरअसल,वैदिक धर्म के अनुसार भगवान् विष्णु के दस अवतार है,इन्ही अवतारों में वराह को तीसरा अवतार माना गया है.

वैसे कहा जाता है की पुराने समय में किलों के प्रवेश द्वार पर वराह की स्थापना करने के पीछे ऐतिहासिक काल के हिन्दू राजाओं का खास उदेश्य था.उस वक़्त की स्थिति यह थी कि पुरे भारत पर मुस्लिम राजाओं का शासन था.मुग़ल काल में तो हिन्दू राजाओं की कुछ ज्यादा ही ख़राब हालत थी.औरंगजेब ने हिन्दुओं की मूर्ति को तोड़ वहां मस्जिद बनाना शुरू किया.मुस्लिम समुदाय में वराह (सुअर) को निषिद्ध और अपवित्र माना जाता है.इस मजहब के लोग वराह के पास से गुजरना भी पाप समझते है. इसी बात का फायदा उठा कर हिन्दू राजाओं ने मंदिरों के प्रवेश द्वार पर वराह मूर्तियों को बनवाया ताकि इसे देख कर मुस्लिम शासक अन्दर ना आये.और इस तरह मंदिर उनके आतंक से बचा रह सके.

यही कारण हो सकता है की यहाँ भी इसी लिए इस मंदिर को बनाया गया होगा और इसके प्रवेश द्वार का नाम भी ‘वराह द्वार’ रखा गया होगा.

यहाँ के लोगों का कहना भी कुछ ऐसा ही है,इनके अनुसार औरंगजेब ने रामटेक के राम मंदिर को तोड़ने के लिए यहाँ हमला भी किया था,लेकिन यहाँ के अन्दर आने वाले दरवाजे का नाम और यही वराह मूर्ति को देख कर अन्दर जाना अच्छा नहीं समझा और वहीँ से वो सब लौट गए.यहाँ कई और छोटे छोटे मंदिर थे जिन्हें देखने के बाद हम लोग वापस अपनी गाडी के पास आगये.अब हमारे सफ़र का दूसरा पड़ाव हमें पार करना था. और वो पड़ाव था खिंडसी.

रामटेक से पूर्व की ओर खिंडसी करीब 5 किलोमीटर की दुरी पर स्थित है. सन 1901 में इसे ब्रिटिश सरकार ने बनवाया था. सुर और कपिला नदी के पानी को संरक्षित करने के लिए दो पहाड़ियों पर बांध बनाया गया था. उस वक़्त इसके पानी से खेती करने के लिए सिचाई भी होता था.सहकारी स्तर पर इसमें मछलियों को पाला भी जाता था.हालांकि, वर्त्तमान में इससे सिंचाई का कार्य बंद कर दिया गया है.पर लघु सिंचाई विभाग,महाराष्ट्र की ओर से आज यहाँ मतस्य पालन किया जा रहा है.

साथ ही,  यहाँ पर्यटकों को आकर्षित करने के लिए इसे 1994 से पर्यटन क्षेत्र भी घोषित किया गया है. यहाँ बोटिंग की भी व्यवस्था की गयी है. जिसका हमसभी ने खूब लुत्फ़ उठाया. यहाँ बच्चे तो बच्चे बड़ों ने भी पानी से खूब मस्ती की और हमसब के कूल पोज देख कर हमारे कैमरे ने भी हमारे हर एक एक्टिविटी को क्लिक किया.

यहाँ हमने लाइफ जैकट पहन कर बोटिंग भी की. मोटर बोट पर बैठ कर झील की लहरों को चीरते हुए हमने इसका खूब आनंद उठाया.  काफी दिनों के बाद हमारी झोली में ऐसे मस्ती भरे पल मिले थे, सारे फैमिली मेंबर्स के साथ हमने इसे खुल कर जिया. अंकल – आंटी का साथ, दोनों जीजू के साथ चलने वाली हसी मजाक, दीदीयों का मेरे ऊपर केयर और बच्चों संग की गयी धमा-चौकरी ने इस दिन को हमसभी के लिए यादगार बना दिया.

 

घूमते – घूमते अब दिन भी चढ़ने लगा था और भूख भी लग रही तो हमसभी वहीँ के होटल में चले आये और टूट पड़े अपने अपने पसंद की चीजों पर.

अब फिर से रिफ्रेश होकर हम तैयार थे अपनी अगली जर्नी की ओर.इस बार हमे बताया गया की अब हमे रामधाम जाना है. वहां जाने पर हमने देखा यह एक बड़ा पर्यटन स्थल था. काफी बड़े भूभाग पर इसे बनाया गया था.

 इसके अन्दर बच्चों से लेकर बड़े-बुजुर्गो सब के लिए देखने और घुमने लायक व्यवस्था थी.यहाँ संगीत में रूचि रखने वाले लोक नृत्य और कठपुतली डांस का आनंद उठा सकते है.तो बच्चों को यहाँ दिखाए जाने वाले जादू के खेल को देख कर बड़ा मज़ा आता है.

रोशनी और संगीत के जरिये दिखाए जाने वाले शिव बारात की तो पूछिए मत,बिलकुल मजेदार.15 से 20 मिनट का समय कब गुजर जाता है पता भी नही चलता. एग्रो पार्क के रूप में फूलों और सब्जियों के पौधों को देखने की एक अलग व्यवस्था.देखने योग्य.अगर कभी गाँव की बैलगाडी पर बैठ कर खेत नही देखा तो यहाँ देख सकते है.

वो भी बिलकुल वैसी ही फीलिंग्स के साथ.हाँ इसके लिए आपको अलग से पैसे देने होंगे. रामधाम में विश्व का सबसे बड़ा ॐ बना है.जो लिम्का बुक ऑफ़ रिकार्ड्स में भी दर्ज है.देश का गौरव कहलाने वाले इस रामधाम को इसकी अलौकिक कृति के लिए लिम्का बुक ने इसे सम्मानित भी किया है.

रामधाम में भगवान् राम के जीवन से जुडी हर घटना को तस्वीरों के जरिये दिखाया गया है.वो भी श्लोकों और दोहों के साथ.

ठीक वैसे ही कृष्ण धाम भी है जहाँ भगवान् कृष्ण के जीवन की झांकी प्रस्तुत की गयी है. अगर आप वैष्णो देवी या अमरनाथ की गुफाओं में नही गये है तो यहाँ ठीक वैसा ही प्रतिरूप बनाया गया है जो बिलकुल असली यात्रा सा अनुभव कराता है. एक अलग रोमांच यहाँ हमें महसूस हो रहा था.

पर वक़्त पर आखिर किसका जोर चलता है.इन अद्वितीय स्थानों की यात्रा के बाद अब हमें वापस लौटना था. यहाँ के यादों की गट्ठरी दिल में बांधे हमसभी यहाँ से विदा हुए.

  

 

 

 

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