अपनी गुजरात यात्रा के दुसरे पड़ाव यानि अहमदाबाद घूमने के बाद अब हमें सोमनाथ मंदिर पहुंचना था. इसलिए सुबह ही हमलोग अहमदाबाद स्टेशन जाने के लिए तैयार हो गए. जबलपुर-सोमनाथ एक्सप्रेस में हमारा रिजर्वेशन था. ट्रेन के आने का वक़्त सवा आठ बजे था. लेकिन यहां भी ट्रेन लेट थी. आई 9 बजे. तब तक बोरियत से बचने के लिए कैमरा ऑन किया और लग गए तस्वीरें उतारने. अभी कुछ ही फोटोज क्लिक हुई थी कि मेरे मोबाइल पर नोटिफिकेशन मैसेज आया कि वाई-फाई नेटवर्क अवेलेबल हेयर. जल्दी जल्दी मोबाइल के वाई फाई सेटिंग विंडो में जाकर सर्च किया तो देखा इंडियन रेलवे का वाई-फाई काम कर रहा है. बस फिर क्या था तुरंत जीजू को भी ये खुशखबरी दे कर खुद को रजिस्टर किया और हो गए तमाम सोशल नेटवर्किंग साइट्स पर ऑनलाइन. सोचा चलो ट्रेन लेट रहे तो रहे इधर फ्री का नेट तो मिल रहा है ना, और क्या चाहिए. स्पीड भी ठीक-ठाक ही थी. बाद में ट्रेन आई और जब तक प्लेटफार्म से नहीं खुली तब तक हम लोग रेलवे के इस फ्री सेवा का लाभ उठाते रहे. कितनी अच्छी सुविधा है यह यात्रियों के लिए, मेरे विचार से तो अपने पटना जंक्शन को भी वाई-फाई से लैस कर देना चाहिए. ट्रेन लेट रहने के बावजूद कोई हंगामा ही नहीं करेगा. सब अपने अपने मोबाइल-लैपटॉप में बिजी जो रहेंगे. हैं ना अच्छा आईडिया. तो अब ट्रेन पटरी पर सरपट दौड़ने लगी थी और अहमदाबाद स्टेशन के साथ ही उसका वाई-फाई सिग्नल भी पीछे ही छुट चुका था. तो मोबाइल पॉकेट के हवाले कर फिर से कैमरा निकाल लिया.

ट्रेन में टीटी भी खूब अवैध पैसों की उगाही करते हैं. यह बात पहले से मालुम तो थी पर नजदीक से देखने का मौका इसी गुजरात यात्रा के दौरान मिल रहा था. क्या हुआ कि हमलोगों की सीट एस 6 बोगी में 21(MB), 22(UB), 23(SL) और 24(SU) थी. हमसभी अपने 23 नम्बर के सीट पर बैठ कर नास्ता कर रहे थे, तभी स्नेहा बोली की मुझे मिडिल बर्थ पर सोने जाना है. जीजू ने देखा कि वहां एक लड़का सो रहा है. उसे जगाते हुए बोले की उठो यहां से और जाकर ऊपर वाले सीट (वो भी अपनी ही थी) पर सो जाओ. लेकिन वो उठने के बजाये यह कह कर फिर से सोने लग गया कि ऊपर हवा नहीं आती. अरे ये क्या बात हुई. सीट हमारी है और हमें ही मना कर रहे हो. तब तक उस लड़के के साथ उसके दो दोस्त भी आ गए. जब जीजू ने कहा कि यह सीट हमारी है तो वो भी उस सीट पर अपना दावा जताने लगा. जब उनसे टिकट मांगा तो वो जनरल क्लास के टिकट पर पेन से सीट नंबर 21 लिखा हुआ दिखाने लगे और कहा कि टीटी ने 400 रूपए में यह सीट उसे अलाट किया है. फिर क्या था खूब हंसी आई, जब हमलोगों ने दो महीने पहले कंप्यूटर जेनरेटेड काउंटर टिकट दिखाया तो उसे देख वो लड़के भी समझ गए कि टीटी ने दिन दहाड़े उनलोगों से 400 रूपए लूट लिया. बाद में बेचारों को वहां से हटना पड़ा.

रास्ते में वांकानेर स्टेशन आया तो मुन्नी आंटी को सभी याद करने लगे. मौसा जी यही पोस्टेड हैं और वापसी में हमलोगों को उनके यहां भी एक रात रुकना है. हां पर तब यह बात नहीं मालूम थी कि ट्रेन से उनका घर दिखता है, बल्कि पास में ही है, वरना आंटी को उनके बालकनी के पास बुलाकर ट्रेन से ही हाय-हेलो कह देता.

सोमनाथ जाने के क्रम में ट्रेन की खिड़की से बाहर का नजारा बड़ा सुन्दर दिख रहा था. कहीं पहाड़ी तो कहीं खेत और आगे चलकर मिले खूब सारे नारियल के पेड़. कहीं कहीं केले के बगान भी नजर आ रहे थे. प्रकृति के इन्ही लुभावन दृश्यों में ऐसे खोये रहे कि पता भी नहीं चला कि कब अहमदाबाद से 415 किलोमीटर की दूरी तय कर ट्रेन सोमनाथ स्टेशन पर आ लगी.

वैसे यह तो हमलोग जानते थे कि इस ट्रेन की आखिरी मंजिल यही तक है पर जब ट्रेन से उतरें तो देखा की अरे यहां से आगे तो अब कोई और ट्रेन भी नहीं जा सकती. सामने पटरी नहीं बल्कि सोमनाथ स्टेशन की इमारत खड़ी थी.

सामानों के साथ जैसे ही स्टेशन से बाहर निकले ऑटो वाले और होटल वालों के एजेंट ने हमें घेर लिया. सभी अपने अपने होटल में हमें ठहराने के लिए उतावले हुए जा रहे थे. पर हमलोगों को तो मौसा जी के बताये होटल में ही रुकना था इसलिए जीजू ने एक ऑटो वाले से बात की और उसने 100 रूपए में हमें लीलावती अतिथि भवन के बुकिंग ऑफिस ले गया, वहां रूम लेने वालों की पहले से ही काफी भीड़ थी.

अंदर काउंटर पर बैठे व्यक्ति ने बताया कि सारे एसी कमरे बुक हैं. इसलिए एसी तो नहीं पर 600 रूपए में एक डीलक्स रूम हमलोगों ने ले लिया. पर काउंटर पर 900 रूपए जमा करना पड़ा, वहां बताया गया कि 300 रूपए सिक्यूरिटी मनी के रूप में जमा रहेंगे जो बाद में चेक आउट के वक़्त वापस मिल जायेंगे. फिर उसी ऑटो से हमसभी लीलावती अतिथि भवन आ गए.

जहां नीचे रिसेप्शन पर जीजू ने बुकिंग की रसीद दिखाई तो होटल के स्टाफ ने हमारा सामान साथ लेकर हमें अपने कमरे (19बी)तक छोड़ आया. रूम देखा तो ठीक-ठाक ही था, सिवाय एसी के सभी सुविधाएं मौजूद थी. बड़े से रूम में बड़ा सा बेड, सामने दीवार पर एलसीडी टीवी, बेड के साइड में होटल स्टाफ को बुलाने के लिए टेलिफोन, एक ओर सोफा तो दूसरी ओर लंबा शीशा लगा ड्रेसिंग टेबल. साथ में बाहर का नजारा देखने के लिए छोटी सी बालकनी भी थी. बाथरूम भी काफी बड़ा था यहां, एक बड़ा पर्दा लगा कर इसे दो भाग में बांट दिया गया था. एक भाग में कमोड तो दुसरे में बेसिन और नहाने की सुविधा. बस फिर क्या था दिन भर के सफ़र से हमलोग थके तो थे ही, तुरंत नहाने चले गए. जब सभी कोई नहा कर तैयार हुए तो घड़ी पर नजर गयी, तब तक आठ बज चुके थे और इस दौरान हम लोगों ने सोमनाथ मंदिर परिसर में होने वाले साउंड एंड लाइट शो को मिस कर दिया.

यह साढ़े सात बजे से साढ़े आठ बजे तक चलता है, जिसमें सोमनाथ मंदिर के पुरे इतिहास का बड़ा ही सुन्दर व सचित्र वर्णन किया जाता है. खैर हमलोग नीचे उतरे और होटल कैंपस में मौजूद इसके भोजनालय की ओर गए. यहां जानकारी मिली कि डिनर 8 बजे से 11 बजे रात तक ही मिलेगा, यानि अभी हमलोग के पास तीन घंटे है घुमने के लिए. तो निकल गए सोमनाथ मंदिर कि ओर. होटल से मंदिर वाकिंग डिस्टेंस पर ही था इसलिए पैदल ही घूमते-फिरते पहुंच गए.

दूर से ही रंगविरंगी रोशनियों से सजा सोमनाथ मंदिर दिखाई दे रहा था, जिसे देखते ही दोनों हाथ खुद ब खुद प्रणाम करने के लिए उठ गए. विश्वास ही नहीं हो रहा था कि भगवान शिव के बारह ज्योतिर्लिंगों में से पहले ज्योतिर्लिंग का सच में दर्शन करने जा रहा हूं. जैसे जैसे मंदिर के पास पहुंच रहा था वैसे वैसे लगता अपने आराध्यदेव से करीब होता जा रहा हूं. रात का वक़्त था तो तस्वीरें ऐसे भी अच्छी नहीं आती मंदिर की इसलिए अपने सारे मोबाइल और कैमरे दी के हैंड बैग में डाल दिया. मंदिर के अंदर कैमरा और मोबाइल ले जाना मना है, इसलिए मैं मंदिर के बाहर बने दिग्विजय द्वार के पास बैग लेकर एक चेयर पर बैठ गया, दीदी-जीजू स्नेहा-ख़ुशी को लेकर मंदिर के अंदर चले गए.

जहां मैं बैठा था उस दिग्विजय द्वार को 1970 में जामनगर की राजमाता ने अपने स्वर्गीय पति की स्मृति में बनवाया था. इस द्वार के पास ही पूर्व गृह मंत्री सरदार वलभ भाई पटेल की प्रतिमा थी. वहां बैठे-बैठे ही नजर गयी उस बोर्ड पर जिसे सोमनाथ मंदिर प्रबंधन ने हाल ही में लगाया था. इसी में वह विवादित आदेश लिखा था, कि गैर हिन्दुओं को ट्रस्ट के जनरल मैनेजर से परमिशन लेने के बाद ही प्रवेश करने की इजाजत मिल सकती है. इस पर काफी विवाद भी हुआ था. मैं सोचने लग गया कि क्या ऐसा भी दिन आ गया कि भगवान अपने ही बनाये जीवों से भेद भाव करने लगे. आखिर क्या वजह है कि भगवान की सेवा में लगे इन भक्तों को सोमनाथ सही दिशा क्यों नहीं दिखा रहे. अरे अगर कोई गैर हिन्दू आ भी गया तो उसे ये कथित भक्त पहचानेंगे कैसे? सिर्फ उनके कपड़ों, बोली से? पीके फिल्म की तरह अगर सब एक दुसरे के गेटअप में आ गए तो? तब क्या होगा? सोचते – सोचते अचानक पिछले दिन का एक जोक याद आ गया कि सोमनाथ ट्रस्ट वालों ने एक मशीन लगायी है जो गेट पर ही इंसानों को स्कैन कर उन्हें हिन्दू और गैर हिन्दू की पहचान कर लेगा. सोचते हुए अचानक हंसी आ गयी. तभी जीजू बाहर आ गए और मैं उन्हें बैग सौप कर मंदिर के अंदर दाखिल हुआ.

अंदर सिक्यूरिटी संबंधित फॉर्मेलिटी पूरी कर पहले ज्योतिर्लिंग के दर्शन करने लाइन में लग गया.  बाहर से यह मंदिर तो भव्य दिखता ही है अंदर भी मंदिर की विशालता देख मैं आश्चर्य चकित रह गया. मैं उस स्थान पर खड़ा था जिसे देश के प्राचीनतम तीर्थ स्थानों में से एक माना जाता है. जिसका उल्लेख स्कन्द पुराण, श्रीमद भागवत गीता, शिव पुराण और ऋग्वेद में भी मिलता है. सामने जो फूलों से सजा आदि शिवलिंग दिख रहा था उसे शिव के बारह ज्योतिर्लिंगों में से पहला ज्योतिर्लिंग माना जाता है. इसकी मनमोहक छटा देखते ही बनती थी. इस मंदिर के बारे में ही कहीं पढ़ा था कि इसे चंद्रदेव सोमराज ने बनाया था. ऋग्वेद में भी इस बात का जिक्र है. एक पौराणिक कथा के अनुसार भगवान ब्रह्मा के पुत्र दक्ष की 27 पुत्रियाँ थी. उनका विवाह सोमराज के साथ हुआ था. दक्ष की पुत्रियों ने उनसे शिकायत की कि चंद्रदेव सोमराज सिर्फ रोहिणी को ही प्रेम करते है और बाकी किसी पर ध्यान नहीं देते.

इससे क्रोधित होकर महाराजा दक्ष ने चंद्रदेव को श्राप दे दिया कि वह कांतिहीन हो जाये. जब सच में चंद्रदेव का भास धूमिल होने लगा तब उनकी पुत्रियों ने उनका श्राप वापस लेने की अपने पिता से प्रार्थना की तो उन्होंने कहा कि सरस्वती के मुहाने पर समुन्द्र में स्नान करने से श्राप के प्रकोप को रोका जा सकता है. तब सोमराज ने सरस्वती के मुहाने पर स्थित सिन्धु (अरब सागर) में स्नान करके भगवान शिव की आराधना की जिस से प्रभु शिव यहां प्रकट हुए और उनका उद्धार किया. इसके बाद चंद्रदेव ने यहाँ शिवजी का एक स्वर्ण मंदिर बनवाया. यहां जो ज्योतिर्लिंग स्थापित हुआ उसका नाम सोमनाथ (जिसका अर्थ है चंद्र के स्वामी) पड़ गया. चूंकि चंद्रमा ने यहां अपनी कांति वापस पाई थी तो इस क्षेत्र को ‘प्रभास पाटन’ के नाम से जाना जाने लगा. फिर बाद में महाशिवभक्त रावण ने इस मंदिर को चांदी का बनवाया और उसके बाद भगवान श्री कृष्ण ने द्वारिका पर अपने शासन केदौरान इसे चंदन का बनवाया.

मैं हैरत में था यह सोच कर जिस मंदिर को एक दो बार नहीं बल्कि 17 बार खंडित किया गया, लूटा गया, शिवलिंग को तोड़ा गया, आज भी उस मंदिर की भव्यता वैसी ही कायम है. 1026 में मंगोल सरदार महमूद गजनवी ने सोमनाथ मंदिर पर हमला किया उसकी संपति लुटी थी, यहां पर चढ़े सोना चांदी तक के सभी आभूषण को लूट लिया.

जिस शिवलिंग को खंडित किया, वह आदि शिवलिंग था. इसके बाद गुजरात के राजा भीम और मालवा के राजा भोज ने इसका पुननिर्माण कराया. जब दिल्ली सल्तनत ने गुजरात पर कब्ज़ा किया तो दोबारा प्रतिष्टित किये गए शिवलिंग को 1300 में अलाउद्दीन की सेना ने खंडित किया. सोमनाथ मंदिर का बार बार खंडन और जीर्णोधार का सिलसिला चलता रहा. राजा कुमार पाल द्वारा इसी स्थान पर अंतिम मंदिर बनवाया गया था. इसके बाद राजा भीमदेव और वर्ष 1093 में सिद्धराज जयसिंह ने इस मंदिर के सौंदर्यीकरण में अहम् भूमिका निभाई.

बाद में सौराष्ट्र के पूर्व राजा दिग्विजय सिंह ने 8 मई 1950 को मंदिर की आधारशिला रखी. 11 मई 1951 को प्रथम राष्ट्रपति डॉ राजेंद्र प्रसाद ने मंदिर में पुरातत्व विभाग से उत्खनन द्वारा प्राप्त ब्रह्मशिला पर ज्योतिर्लिंग स्थापित किया. सोमनाथ मंदिर के मूल मंदिर स्थल पर यह नया सोमनाथ मंदिर पूर्ण रूप से 1962 में बन कर तैयार हो गया. जिसका डिजाईन प्रभा शंकर सोमपूरा ने बनाया था.  इस मंदिर के निर्माण में तत्कालीन गृहमंत्री सरदार बल्लभ भाई पटेल का भी बड़ा योगदान रहा था.

तो इसी तरह कुछ देर मंदिर की परिक्रमा कर मैं भी वापस बाहर आ गया. अब हमसभी वापस होटल जाने लगे. रास्ते में एक जगह डाभ का बाजार लगा था. वहां हमसभी ने नारियल पानी पिया.

अब आठ बजने वाले थे और हमें नाश्ता कर सोमनाथ से द्वारिका लौटना भी था. रात में ही जीजू ने अपने होटल कैंपस में मौजूद राजू टूर एंड ट्रेवल से बात कर द्वारिका जाने के लिए उसे बुक कर लिया था. इसलिए हमलोग सोमनाथ मंदिर को आखिरी प्रणाम करते हुए वहां से लौट आये.

होटल पहुंच कर सामान ठीक किये और नीचे उतर गए भोजनालय की ओर. सुबह के नास्ते में वहां एक आप्शन 10 रूपए की चाय और 15 रूपए प्लेट पोहा का था. हमसबको यही सबसे हल्का नाश्ता लगा. सबके लिए एक-एक प्लेट पोहा ले आया. अरे ये क्या. ये भी मीठा. कोई नहीं चलेगा, भूख लगी हो तो सब चलता है. जल्दी जल्दी खाकर हम लोग बाहर आये. यहां इंडिका (एसी) आकर लगी थी. सारा लगेज इसकी डिक्की में डाल अब सोमनाथ से द्वारिका के लिए हमलोगों ने प्रस्थान किया.

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