पटना से देवघरबासुकीनाथ यात्रा के बाद हम सफर के आखिरी पड़ाव पर थे. अपने आराध्य महादेव के दर्शन के बाद अब मातारानी के बुलावे पर तारापीठ जा रहे थे. रात करीब दस बजे बासुकीनाथ से हमारी ट्रेन रामपुर हाट रेलवे स्टेशन पहुंची.

रामपुर हाट से तारापीठ मंदिर की दूरी 9 किलोमीटर है. वैसे, हावड़ा – रामपुरहाट रेल लाइन पर रामपुर हाट से पहले तारापीठ रोड स्टेशन भी है. मंदिर से इसकी दूरी लगभग साढ़े 6 किलोमीटर है. पर, यहां ज्यादा ट्रेनों का ठहराव नहीं होता. सिर्फ लोकल ट्रेन ही इस रूट पर चलती है. ऐसे में बाहर से यहां आनेवाले लोगों के लिए रामपुर हाट ही तारापीठ का प्रमुख स्टेशन माना जाता है. और फिर यह दिल्ली, वाराणसी, कोलकाता, मुंबई जैसे कई बड़े शहरों से भी सीधी रेल सेवा से जुड़ा है.
रामपुर हाट रेलवे स्टेशन
स्टेशन से बाहर निकल सड़क किनारे कुछ देर इंतजार के बाद एक ऑटो हमें मिल गया. रात के अंधेरे को पार करते हुए हमारी गाड़ी तारापीठ के रास्ते पर फर्राटा भर रही थी. इधर थकान की वजह से हमारी आंखें बोझिल हो रही थी. देवघर में बाबा भोलेनाथ के दर्शन के लिए हमसभी सुबह जल्दी जाग गए थे, फिर उसके बाद से हमारी यात्रा अनवरत जारी थी.

बाबाधाम में घंटों लंबी कतारों में लगकर पूजा की, फिर बिना कुछ खाए बासुकीनाथ मंदिर के लिए निकल पड़े. मंदिर में भोलेनाथ के दर्शन के बाद गर्मी की उस भरी दुपहरी में गाड़ी के लिए भटकना. फिर ट्रेन के इंतजार में घंटों उस बदहाल बासुकीनाथ रेलवे स्टेशन को झेलना. तारापीठ पहुंचते – पहुंचते ऐसा लग रहा था मानों अब इस शरीर में कोई जान ही नहीं बची हो. थकावट और ठंडी हवाओं के झोंके हमें बार – बार नींद में ले जा रहे थे.
करीब आधा – पौन घंटे के बाद ऑटो वाले ने हमें मंदिर जाने वाले रास्ते के मुख्य सड़क पर उतार दिया. पश्चिम बंगाल की धर्म नगरी तारापीठ में प्रवेश करते ही चारों ओर हमें बड़ी – बड़ी बिल्डिंग दिख रही थी. पता चला ये सभी होटल है. तभी तो ऑटो के रुकते ही कई लोग हमारे पास आ गए. सभी अपने-अपने होटल में हमें ले जाना चाहते थे. तारापीठ मंदिर के कारण यहां टूरिज्म इंडस्ट्री काफी डेवलप है. वैसे, अपनी घुमक्कड़ी से प्राप्त अनुभव के कारण इतना तो दावे से कह सकता हूं कि बंगाल से मां काली का अद्भुत संबंध है. यहां के लोग सदियों से मां काली के उपासक हैं. कोलकाता की यात्रा के दौरान कालीघाट और दक्षिणेश्वर मंदिर घूमते हुए भी मुझे ऐसा ही महसूस हो रहा था. और अब उस कोलकाता से 222 किलोमीटर दूर इस पवित्र तारापीठ में भी मुझे इसका प्रमाण मिल गया.
तारापीठ शहर
ओयो के त्रिनयनी होटल में हमारी बुकिंग पहले से ही थी. ऐसे में सबसे पहले ओयो द्वारा भेजे गए बुकिंग डिटेल्स में दिए गए नंबर पर उस होटल वाले से बात की और लोकेशन पूछा. फिर अपना सामान उठाए सभी चल पड़े मंदिर जाने वाले रास्ते की ओर. बीच – बीच में गूगल मैप की मदद के बदौलत थोड़े ही देर में हम होटल पहुंच चुके थे. रिसेप्शन पर होटल वाले ने आईडी देखने और कुछ फॉर्म भरवाने के बाद हमें अपने कमरे की चाबी दे दी. यहां हमारे पांच कमरे बुक थे. कुछ ही मिनटों में होटल स्टाफ ने सारा लगेज हमारे कमरों में पहुंचा दिया.
रात के 11 बज चुके थे और सबको भूख भी जबरदस्त लगी हुई थी. फ्रेश होने के बाद हमलोग होटल से नीचे उतरे. आसपास वाले कई दुकान – होटल बंद हो चुके थे. पैदल चलते हुए एक बार फिर हमलोग मेन रोड पर आ गए. यहां देखा एक होटल के बाहर गरमागरम रोटियां चूल्हे पर सेंकी जा रही है. बस फिर क्या था भीड़ को चीरते हुए सबके सब घुस गए अंदर और जहां भी खाली कुर्सियां दिखी, कब्ज़ा जमाकर बैठ गए. भूख इतनी तेज थी कि खाने को लेकर किसी ने अलग – अलग अपनी कोई फरमाइश नहीं की. बस एक ने जो ऑर्डर किया सबने उसी को अपनी भी मंजूरी दे दी. गरमागरम रोटी और पनीर की सब्जी खाने के बाद अब हम वापस अपने होटल लौट गए.
आज की तरह कल फिर हमें सुबह जल्दी जागना था. कहा गया कि मंदिर में काफी भीड़ होती है. ऐसे में जितनी जल्दी सुबह उठकर मंदिर जाएंगे हमारे लिए उतना अच्छा होगा. फिर कल ही हमें वापस पटना लौटना भी था. रामपुर हाट से जसीडीह और फिर जसीडीह से पटना के लिए हमारी ट्रेन थी. मातारानी के दर्शन को व्याकुल हमसभी सुबह जल्दी उठने के लिए अपने – अपने कमरों में सोने चले गए.
वीरभूम, पश्चिम बंगाल का एक बड़ा जिला है, जो शक्तिपीठों का स्थान भी कहलाता है. यहां कई शक्तिपीठ हैं. जिनमें दुबराजपुर स्टेशन से सात किलोमीटर दूर वक्रेश्वर है, यहां पापहर नदी के तट पर माता का भ्रूमध्य गिरा था. इस जगह को महिषमर्दिनी शक्तिपीठ भी कहते हैं. नलहाटी स्टेशन के पास नालहाटी में माता के पैर की हड्डी गिरी थी. बोलपुर स्टेशन से 4 किलोमीटर उत्तर – पूर्व में कोपई नदी किनारे कांची में देवी कंकलेश्वरी का मंदिर है. यहां माता की अस्थि गिरी थी, इस कारण इसे कंकालीताला भी कहा जाता है. सैंथिया रेलवे स्टेशन के निकट नंदीपुर में ही देवी नंदिनी का भी मंदिर है. यहां देवी सती के गले का हार गिरा था. साधना के इस केंद्र तारापीठ में ही महर्षि वशिष्ठ ने मां तारा की उपासना की थी, जिसके बाद उन्हें सिद्धियां प्राप्त हुई थी. पौराणिक मान्यता यह भी है कि राजा दक्ष प्रजापति की बेटी देवी सती के नेत्र का तारा गिरा था. इसलिए इस स्थान को तारापीठ और नयनतारा भी कहा जाने लगा.

तारापीठ की एक विशेषता यह भी है कि ये एक उतरायण यानि दक्षिण से उत्तर की तरफ बहने वाली नदी द्वारिका के किनारे अवस्थित है. प्राय: सभी नदियां उत्तर से दक्षिण की ओर बहती हैं, जबकि देश में द्वारिका ही ऐसी नदी है जिसका बहाव उल्टा होता है. साथ ही ये मंदिर शमशान घाट के पास है. कहा जाता है कि देवी तारा मां काली का ही रूप हैं. इसलिए उनका निवास स्थान जागृत शमशान है. यहां हमेशा चिताएं जलती रहती है. इसके बावजूद यहां आने वाले श्रद्धालुओं को कभी डर नहीं लगता.

अगले दिन सुबह तैयार होकर हमलोग मंदिर जाने के लिए होटल से निकल गए. रास्ते में फूलों की माला, प्रसाद की कई दुकानें खुल चुकी थी. हम सबने भी एक दुकान से अलग – अलग टोकरियों में फूल – माला और प्रसाद ख़रीदा और मंदिर में दाखिल हुए.

अन्दर शंख की पवित्र ध्वनि से गूंज रहा था मां का दरबार. आंखें बंदकर माता के मंत्र गुनगुनाते श्रद्धालु. भक्ति से भरा ये अलौकिक नजारा देख मन अभिभूत हो गया. अब तो जितनी जल्दी हो बस, मां को नजर भर निहार लेने की चाहत तेज हो उठी थी. पर यहां तो देवी दर्शन के लिए पहले से ही भक्तों की काफी भीड़ थी. लोग लंबी कतारों में खड़े थे. ये देख हमलोगों ने सोचा कि अगर लाइन में लगे तो दर्शन में कई घंटे लग जाएंगे. हालांकि, अब तक जितने मंदिरों की यात्रा की, सब जगह हमलोगों ने अपना भरपूर समय दिया था. दर्शन को लेकर कहीं कोई उतावलापन नहीं था. लेकिन तारापीठ में हमारी मज़बूरी थी. ट्रेन पकड़ने की हड़बड़ी थी, इसलिए इतनी लंबी कतार देख परेशान हो उठे थे.
भगवान के जल्द दर्शन अब कैसे होंगे. सब इसी चिंता में थे. तभी मंदिर में एक जगह टिकट काउंटर देखा तो याद आया कि कहीं पढ़ा था, तारापीठ मंदिर में स्पेशल दर्शन भी होते हैं. रसीद लेने के बाद मंदिर में जल्दी दर्शन हो जाते हैं. फिर क्या था, पापा और जीजू ने मंदिर के पुजारी से बात की. उन्होंने बताया कि अगर आपलोग जल्द दर्शन करना चाहते हैं तो कुछ पैसे खर्च करने होंगे. बच्चों को छोड़ दें तो बड़ों के हिसाब से प्रति व्यक्ति दो सौ रुपए लगेंगे. यानि वीआईपी दर्शन के लिए कुल दो हजार रुपए हमें खर्च करने होंगे.
तारापीठ मंदिर में टिकट काउंटर
हमने सोचा कि ये पैसे सरकारी खाते में जाएंगे इसलिए हामी भर दी. फिर हम सबको मुख्य मंदिर के बगल में बने बांस से बने एक एंट्री गेट पर ले जाया गया. वहां देखा कुछ लोग खड़े थे. पुजारी ने इन्हें ही दो हजार रुपए देने को कहा. हमने भी रुपए इनके हाथों में दे दिए. रसीद के बारे में पूछा तो बांस ऊपर कर कहने लगे कि जल्दी अंदर जाइए. शीघ्र दर्शन के नाम पर मंदिर में ये कैसी लूट मची थी, मैं तो देख कर ही हैरान रह गया. अगर रसीद मिली होती तो हमें संतोष होता कि हमारे पैसे मंदिर के ट्रस्ट के पास जाएंगे. पर बिना किसी रसीद या टिकट के कैसे मान लूं कि यहां कोई भ्रष्टाचार नहीं हो रहा. पर अब कर भी क्या सकता था. जल्दी दर्शन की मज़बूरी थी इसलिए उस चोर दरवाजे से ही हमलोग दाखिल हुए.
पैसे देनेवालों की इधर से होती है एंट्री
एक तरफ घंटों लाइन में लगे हुए लोग, तो वहीं दूसरी ओर हमसब थे जो मंदिर आते ही गर्भगृह में प्रवेश कर गए. मंदिर में माता को चढ़ाने के लिए हमसभी लाल चुनरी, आलता और फूल – माला – प्रसाद की टोकरी लिए हुए थे, पर हमें ये देख आश्चर्य हुआ कि कुछ लोग ऐसे भी थे जिन्होंने टोकरी में फूलों के बीच प्रसाद की जगह शराब की बोतलें सजा रखी थी. बाद में पता चला कि ये स्थान तांत्रिकों और अघोरियों के लिए बहुत खास है. यहां शराब न सिर्फ प्रसाद के रूप में चढ़ाया जाता है, बल्कि इससे माता का स्नान भी होता है.
गर्भगृह के अंदर पहुंचते ही सामने मां के चरण दिखे. यहां पुजारी ने संकल्प कराया. लाइन में लगी महिलाएं मां के पांव पर आलता डाल रही थीं. यहां से आगे बढ़ने पर सामने मां की अद्भुत छवि वाली प्रतिमा के दर्शन हुए. भगवान शिव को अपनी गोद में लेकर मां उन्हें अपना दूध पिला रही थीं. मां और भोलेनाथ की इस प्रतिमा के बारे में कहा जाता है कि समुंद्र मंथन के दौरान जब महादेव ने विषपान किया था, तब समस्त देवी – देवताओं के आग्रह करने पर मां ने उन्हें स्तनपान कराया. उस अमृत को पीने के बाद ही भोलेनाथ को उस विष के जलन से मुक्ति मिली थी. माता के दर्शन करने के दौरान वहां बैठे पुजारी ने आशीर्वाद के तौर पर हमारे माथे पर तिलक लगाया. इसके बाद मां के चरण छूकर हम बाहर निकल गए.

दर्शन के बाद कुछ देर आराम करने के लिए मंदिर परिसर में ही एक जगह हमसब लोग बैठ गए. अब बारी तारापीठ यात्रा को तस्वीरों में संजोने की थी. सब अपने – अपने मोबाइल से सेल्फी लेने में व्यस्त हो गए. और इधर मैं निकल पड़ा मंदिर भ्रमण के लिए. घूमते हुए यहां हमारी नजर एक तालाब पर पड़ी. कई लोग यहां भी धूप – अगरबत्ती जलाकर पूजा कर रहे थे. पूछने पर पता चला की इसे जीवित कुंड कहा जाता है. पुराने समय में एक बार एक कारोबारी अपने पुत्र और सेवकों के साथ व्यापार करने तारापीठ पहुंचे थे. उनके बेटे को यहां सांप ने डस लिया जिससे उसकी मौत हो गयी. फिर सेवक उन्हें इस तालाब के पास लेकर आएं. दिखाया कि कैसे मरी हुई मछलियां इस तालाब के जल का स्पर्श पाकर जीवित हो जा रहीं.
जीवित तालाब
ये सब देख सेठ ने भी अपने बेटे को इसी कुंड के जल में डाल दिया. तभी चमत्कार हुआ और उनका पुत्र फिर से जीवित हो उठा. तब से लोगों में इसकी आस्था बढ़ गई और इसे जीवित तालाब कहा जाने लगा. इस तालाब की महत्ता इतनी थी कि पहले माता को इसी के पवित्र जल से स्नान कराया जाता था. यहां तक की इसी तालाब के जल से उनके भोग के लिए प्रसाद भी तैयार होता था. लेकिन बदलते वक़्त के साथ इस तालाब का स्वरुप भी बदल गया. साफ़ – सफाई के अभाव में अब तो इसका पानी भी काफी गंदा हो गया है.

पूजा – दर्शन के बाद अब हमलोग मंदिर से बाहर निकले. आसपास फूल – पेड़े, साड़ी – चूनरी, पीतल के बर्तन समेत खिलौने और एक से बढ़ कर एक डेकोरेटिव आइटम्स की कई सारी दुकानें थी. विंडो शॉपिंग करते हुए हम आगे बढ़ रहे थे. भूख भी लगने लगी थी तो आगे एक बड़ा और ठीकठाक रेस्टूरेंट दिखा. कचौरी – सब्जी के नाश्ते के साथ ही बंगाल की फेमस मिठाई लेंगचा का भी स्वाद चखा. बंगाल के रोसोगुल्ले की तरह ल्येंग्चा, जिसे हमलोग लेमचा मिठाई कह रहे थे, ये यहां की पहचान है. तभी तो तारापीठ के बाजारों में हर जगह ये मिल रहा था. Bengali Langcha दिखने में तो गुलाब जामुन की तरह लगता है, फर्क बस इतना है कि इसका आकार गोल न होकर लंबा होता है.
लेंगचा मिठाई
रेस्टूरेंट में अपनी भूख मिटाकर अब हम वापस होटल आ गए थे. तारापीठ से आज ही हमें वापस पटना भी लौटना था. रामपुर हाट से जसीडीह और फिर जसीडीह से पटना के लिए हमारी ट्रेन थी. इसलिए सारा सामान पैक भी करना था. होटल पहुंचा तो चाय की तलब लगने लगी थी. फिर हमें ख्याल आया कि ओयो के होटल में तो फ्री ब्रेकफास्ट मिलता ही है. आखिर इस मुफ्त के नाश्ते को क्यों छोड़ा जाए. याद आया कि पिछले साल जब बंगाल में ही दीघा घूमने गए थे, तो यहां भी ओयो की तरफ से कॉम्प्लीमेंट्री ब्रेकफ़ास्ट में सुबह – सुबह चाय, ऑमलेट – टोस्ट मिला था. बस फिर क्या था, होटल के रिसेप्शन पर फोन करके चाय और फ्री ब्रेकफास्ट रूम में पहुंचाने का ऑर्डर देकर सामानों की पैकिंग में लग गए.
तारापीठ मंदिर जाने का रास्ता
थोड़ी देर में चाय के साथ हमारा मुफ्त वाला नाश्ता आ चुका था. पर ये क्या, अभी पैसे खर्च करके रेस्टूरेंट में जो खाया था, ओयो ने भी वही कचौरी – सब्जी हमें खाने को दे दिया. एक तो पहले से ही पेट भर चुका था, फिर होटल से चेक आउट करने का भी समय हो रहा था. तो अब इतना कौन खाता. इसलिए उसे ट्रेन में खाने के लिए हमलोगों ने पैक करवा लिया.
पटना से देवघरबासुकीनाथ – तारापीठ यात्रा पूरी हो चुकी थी. मां तारा के दर्शन कर अब तारापीठ से विदा ले रहे थे. मन में ये आस लिए कि फिर जल्द ही भोलेनाथ और मातारानी का बुलावा हमें आएगा…

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