बनारस प्रवास के दौरान इतने दिनों में शहर और यहां के रास्तों से थोड़ी बहुत जान पहचान होने लगी थी. वाराणसी में हमारे कई रिलेटिव्स रहते हैं, यहां तेलियाबाग़ और विशेश्वरगंज में रहने के दौरान शहर के चौक-चौराहे, गलियों, मंदिरों और गंगा घाटों के इतने चक्कर लगाए कि अब बनारस हमारे लिए अजनबी शहर बिलकुल भी नहीं रह गया था. गौदोलिया, कबीर चौरा, लंका, केंट, लहरतारा आदि इलाकों से तो धीरे धीरे परिचित होने लगा था, साथ ही बनारसी भाषा भी अब हौले हौले जुबां पर चढ़ने लगी थी. यहां के लोगों की बोलचाल में प्रयुक्त होने वाले कई शब्द भी खूब भा रहे थे. मसलन, का गुरु… कईसन होवे… लागत त इहे बा…. हौवन.. जैसे शब्दों को सुनना बड़ा अच्छा लग रहा था.

बनारस में रहते हुए अब तक काशी विश्वनाथ के नए-पुराने दोनों मंदिरों सहित कई अन्य मंदिरों के भी दर्शन हो चुके थे, गंगा घाटों पर कभी गंगा स्नान के लिए तो कभी यूँ ही घुमने के उदेश्य से आना जाना लगा रहा, बीएचयू की विशालता और भव्यता भी देख चुका था और रामनगर किले में जाकर वहां बनारस के इतिहास से भी रुबरु हो गया था. इसलिए अब हमलोगों ने सारनाथ घूमने का प्लान बनाया. जो वाराणसी से करीब 10 किलोमीटर दूर है. और ये दूरी भी हमने अपनी अपनी बाइक और स्कूटी से ही तय किया. हालाँकि यात्रा असुविधाजनक न हो इस कारण हमलोगों ने एक ओला टैक्सी भी बुक कर ली थी. तक़रीबन आधे घंटे के अन्दर हमलोग शहर की चकाचौंध और कोलाहल से दूर सारनाथ के शांत और सुरम्य परिवेश में मौजूद थे. बौद्ध धर्मावलम्बियों के चार बड़े तीर्थों (लुम्बिनी, बोधगया और कुशीनगर) में सारनाथ भी शामिल है. क्योंकि यह भगवान बुद्ध की पहली उपदेश स्थली है. ज्ञान प्राप्त करने के बाद गौतम बुद्ध ने अपना पहला उपदेश यहीं दिया था. इस घटना को धर्म चक्र परिवर्तन कहा जाता है.

सारनाथ में सबसे पहले हमलोगों ने चौखंडी स्तूप देखा. चार भुजाओं वाले आधार पर ईटों से बनी यह विशाल संरचना वस्तुतः बौद्ध स्तूप है, जो गुप्त काल में लगभग चौथी-पांचवी शती में बनायीं गयी थी. इस स्तूप का उल्लेख सातवीं शताब्दी के प्रसिद्ध चीनी यात्री ह्वेनसांग ने भी अपने यात्रा वृतांत में किया था. इस स्तूप की कुल ऊँचाई 93 फीट है. यहां से कई मूर्तियाँ मिली हैं जिसमे धर्म चक्र प्रवर्तन मुद्रा में बुद्ध प्रतिमा भी है. स्तूप के शिखर पर अष्टभुजीय मुग़लकालीन संरचना है जिसके उतरी द्वार पर एक अरबी शिलालेख है. इसके अनुसार मुग़ल बादशाह हुमायूँ की सारनाथ यात्रा को यादगार बनाने के लिए इसका निर्माण राजा टोडरमल के पुत्र गोवर्धन द्वारा 1588 में करवाया गया था.

चौखंडी स्तूप की खासियत इस मायने में ज्यादा है कि बोधगया में ज्ञान प्राप्त करने के बाद भगवान बुद्ध जब सारनाथ आये तो इसी जगह उनकी भेंट उन पांच भिक्षुओं से हुई थी. जिन्हें उन्होंने अपना पहला उपदेश दिया था.

यहां से निकले तो कुछ ही दूर आगे वट थाई मंदिर था, लेकिन हमलोगों के आने से पहले ही यह बंद हो चुका था. मंदिर में दर्शन का समय अप्रैल-सितम्बर के दौरान सुबह 7:15 से शाम 6:00 बजे तक और अक्टूबर-मार्च महीने के दौरान यह मंदिर प्रातः 8:15 से लेकर शाम के 5 बजे तक ही खुला रहता है. मंदिर बंद होने के कारण यहां से आगे बढ़े और पहुंचे मूलगंधकुटी विहार.

यह मंदिर काफी बड़ा और सुन्दर है, जो महाबोधि सोसायटी द्वारा बनाया गया है. इस मंदिर का निर्माण 1931 में किया गया है. मंदिर के अन्दर बड़ी बड़ी तस्वीरें लगी है जिन्हें जापानी चित्रकार कोसेत्सू नोसू ने बनाया था. यहां गौतम बुद्ध की सोने की प्रतिमा स्थापित है. मंदिर परिसर में एक बहुत बड़ा घंटा लगा है, जिसके साथ हमलोगों ने अपनी कई तस्वीरें क्लिक की. मूलगंधकुटी मंदिर के बगल में ही दाई ओर है पवित्र बोधि वृक्ष. यह वही पवित्र स्थल है जहां पर भगवान बुद्ध ने अपने पांच शिष्यों को पहला उपदेश दिया था. यहां जो पीपल का वृक्ष लगा है, उसे श्रीलंका से लाया गया था. सम्राट अशोक की पुत्री संघमित्रा बोधगया स्थित पवित्र पीपल के पेड़ की एक शाखा श्रीलंका के अनुरंधपुरा में लगाई थी. उसी पेड़ की एक टहनी को सारनाथ में लगाया था.

यही एक मिनी जू भी है जिसमे कई पशु-पक्षी रहते है. हमलोग टिकट लेकर जू के अन्दर पहुचे, लेकिन जू देख कर ऐसा लगा कि टिकट के पैसे वसूल ही नहीं हुए. इसलिए जल्दी जल्दी एक चक्कर लगा कर वहां से भी तुरंत निकल लिए.

सारनाथ में इन दर्शनीय स्थलों के अलावे धमेख स्तूप, जैन मंदिर, सम्राट अशोक का चतुर्मुख सिंह स्तंभ, सारनाथ म्यूजियम आदि और भी कई घूमने लायक जगह हैं. हालाँकि देर शाम होने की वजह से ये सभी बंद हो चुके थे, इसकारण हमलोग इन जगहों के बिना दर्शन किए वापस लौट गए.

 

सारनाथ के होटलों में खाने से पहले बरते सावधानी

सारनाथ की एक घटना का जिक्र करना भी यहां बेहद जरुरी है. ताकि आप भी यहां के होटलों में (खास कर वैशाली रेस्टोरेंट में) खाना खाते वक़्त पहले से सावधान रहे. दरअसल हुआ यूँ कि सारनाथ घूमने के बाद हमसब की पेट में चूहे कूदने लगे थे. मुलगंध कुटीर विहार से आगे चौराहे के पास वैशाली रेस्टोरेंट दिखा. फर्स्ट फ्लोर पर स्थित यह होटल बाहर से ठीक ठाक लगा, तो हमलोगों ने यही अपना अड्डा जमा लिया. सबने अपने अपने पसंद की चीजें आर्डर कर दी. हमें बताया गया कि इतने लोगों का खाना आने में कुछ वक़्त लग सकता है. इसलिए सब अपने अपने बातों में बिजी हो गए, और इधर शुरू हो गया मेरे मोबाइल फोटोग्राफी का चस्का. टेबल पर रखी तमाम चीजों के स्नेप लेने लगा. इससे दो फायदे हुए, एक तो तेज भूख से ध्यान हट गया, साथ ही दूसरा फायदा यह हुआ कि इन्स्टाग्राम पर अपलोड करने के लिए ढेर सारी तस्वीरें मेरे मोबाइल में सेव हो गयी.

तक़रीबन पौने घंटा के बाद हमारे टेबल पर वेटर ने प्लेटें लगायी. और फिर हम सभी अपने खाने पर ऐसे टूटे मानो कई दिनों के भूखे हों. हालांकि खाने के साथ साथ मेरी सेल्फी भी जारी रही. कहते हैं न जब तेज भूख लगी हो तो सूखी रोटी भी पकवान लगती है. मेरी भी कुछ ऐसी ही हालत थी. तभी तो खाते खाते जब किसी ने यह कह कर टोका, कि मसाला डोसा का स्वाद कुछ अजीब लग रहा है, मैंने तुरंत पलट कर जवाब दिया, अमां… क्या बोल रहे हो यार? अच्छा तो है. तब मुझे क्या पता था कि इसका भी जवाब मुझे तुरंत मिलने वाला था.

अब तक आधा मसाला डोसा मैं उदरस्थ कर चुका था और अंतिम के कुछ और निवाले शेष थे. इन्हें खाने के लिए मैंने अपनी चम्मच से जैसे ही पलटा, मुझे उसके नीचे सटा हुआ कुछ दिखा. ध्यान से देखा तो एक मरा कीड़ा डोसा के साथ लिपटा हुआ था. यह देख कर तो मेरे होश ही उड़ गए. अभी मैंने ध्यान नहीं दिया होता तो कुछ ही पलों में वो कीड़ा भी मेरे पेट में होता. तत्काल मैंने इसकी शिकायत वैशाली रेस्टोरेंट के मैनेजर से की. बड़ा आश्चर्य हुआ जब इस मामले में उन्होंने बड़े अनमने ढंग से कहा कि अरे कोई बात नहीं आ गया होगा कही से. टूरिस्ट स्पॉट पर आने वाले पर्यटकों के प्रति इनका ये व्यवहार मुझे बहुत अजीब लगा. इधर मेरे प्लेट में कीड़ा देख कर बाकी लोगों ने भी अपना खाना छोड़ दिया. और फिर इस होटल में कभी नहीं खाने का प्रण लेकर हमलोग वैशाली रेस्टोरेंट से निकल गए.

 

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