पटना से पश्चिम बंगाल के सफ़र का ये दूसरा पोस्ट है. पहले पोस्ट में आपने दीघा यात्रा के हमारे अनुभवों को पढ़ा. दीघा में दो रातें गुजारने के बाद अगली सुबह हमें कोलकाता के लिए वापस लौटना था. रेड बस एप से हमने पटना में ही दीघा से कोलकाता के लिए Snemita Paribahan की बस टिकट बुक करवा ली थी. करीब 7 बजे हमारी बस थी. इसलिए अगले दिन हम सुबह – सुबह ही अपने ओयो होटल से चेक आउट कर निकल लिए. होटल से हम पैदल ही बस स्टॉप की ओर चल पड़े, हमें मालूम था कि जहां हमारी बस लगेगी, वहां पहुंचने में हमें ज्यादा वक़्त नहीं लगेगा. वैसे समय भी काफी था हमारे पास और इतनी सुबह बिना कुछ खाए पिए निकले थे तो ऐसे में चाय की तलब भी लग रही थी, फिर क्या था बस स्टॉप के पास ही सड़क किनारे गरमा गरम चाय की चुस्की लेने लगे. जैसे ही चाय ख़त्म की वैसे ही हमारी बस हमारे सामने आकर लग गयी. बस की अधिकतर सीटें फुल थी, हमारी सीट पर भी पहले से दो लड़के – लड़कियां बैठे हुए थे, हमने उन्हें कहा कि ये हमारी सीट है तो वे उठ गए. फिर बस के कंडक्टर को हमने मोबाइल पर अपनी टिकट दिखाई जो हमने ऑनलाइन बुक की थी. थोड़ी देर बाद बस दीघा से कोलकाता के लिए खुल गयी. हम जैसे – जैसे कोलकाता की ओर बढ़ रहे थे, इस शहर को देखने की हमारी लालसा और तीव्र होती जा रही थी.

अंग्रेजों ने अपनी सुविधा के लिए भारत में हुगली नदी के किनारे इस शहर का निर्माण किया था. और इसे अपना व्यापारिक अड्डा बनाया था. तब ये ब्रिटिश इंडिया की राजधानी होने के साथ ही देश का सबसे प्रमुख स्थान हुआ करता था. कोलकाता शहर की उसी पुरानी विरासत को देखने – समझने के लिए हम बेताब थे. पर बस तो यात्रियों को उतारते – चढ़ाते अपनी ही चाल में बढ़ी जा रही थी. दोपहर में हमारी बस एस्पलेनैड बस स्टैंड आकर रुकी. जहां पहले से प्रदीप जीजू हमारा इंतजार कर रहे थे. दीघा के लिए तो हमने ओयो रूम्स की सेवा ली थी, पर कोलकाता में हमारे रहने – खाने और घूमने का सारा इंतजाम इन्हीं के जिम्मे था. बस स्टैंड से ओला कर सबसे पहले वो हमें होटल ले गए, जहां उन्होंने हमारे लिए पहले से ही कमरा बुक करा रखा था. कोलकाता शहर की सड़कों और गलियों से ये मेरा पहला साक्षात्कार हो रहा था.

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कार की खिड़की से मैं शहर को देख रहा था. इतिहास की कई कहानियों को खुद में समेटे कई पुरानी इमारतें आज भी वैसे ही शान से खड़ी है. ओयो – ऊबर जैसे ऑनलाइन कैब सर्विसेज आने के बाद सड़कों पर पीले रंग वाली टैक्सी भी अपने अस्तित्व को बचाने की जदोजहद में लगे हुए हैं. ठीक वैसे ही जैसे यहां हाथ से खींचे जाने वाले रिक्शे सवा सौ साल से भी ज्यादा समय से कोलकाता की पहचान रहे हैं. अब भले इसपर सरकार ने पाबन्दी लगा दी हो, पर एक वक़्त था जब इसे शान की सवारी समझी जाती थी. कोलकाता में हमें हाथ रिक्शा काफी कम दिखाई पड़े. शहर के खुबसूरत नजारों को देखने में हम इतने डूब चुके थे कि घुमावदार गलियों से घूमते हुए कब हमारी कैब उलटाटांगा रोड स्थित आनंदलोक गेस्ट हाउस के सामने खड़ी हो गई पता ही नहीं चला.
होटल रिसेप्शन से चाबी लेकर हम अपने कमरे में पहुंचे. अबतक हमें जोरों की भूख भी सताने लगी थी, तो फ्रेश होने के बाद हमलोग पास के ही एक होटल में पहुंचे. यहां खाने के टेबल पर ही हमने कोलकाता दर्शन की सारी प्लानिंग की. चूंकि हमलोगों के पास समय कम था, बस आज की रात और कल दिनभर ही इस शहर में रुकने वाले थे, और यहां घूमने को बहुत कुछ था, तो समय और दूरी के हिसाब से जीजू ने तय किया कि अभी सबसे पहले विक्टोरिया मेमोरियल घूमने जाएंगे, फिर काली घाट काली मंदिर के दर्शन कर वहां से कोलकाता के स्थानीय बाजारों को देखते हुए उधर से ही डिनर कर वापस होटल आ जाएंगे. इसके बाद अगले दिन सुबह – सुबह उठकर कोलकाता में हमारी घुमक्कड़ी चलेगी. तो सबकुछ सेट हो गया. खाने के बाद अब हमारा अगला पड़ाव विक्टोरिया मेमोरियल हॉल था.

इंग्लैंड की रानी विक्टोरिया को समर्पित ब्रिटिश काल की ये भव्य इमारत पूरी तरह सफ़ेद संगमरमर पत्थरों से बना है. इसका निर्माण साल 1906 से 1921 के बीच राजकुमार प्रिंस ऑफ वेल्स जो बाद में किंग जॉर्ज पंचम बने, उन्होंने करवाया था. यहां की गैलरी में घूमते हुए आपको पेंटिंग्स, मूर्तियां, नक़्शे, पुराने सिक्के, डाक – टिकटों से लेकर कई पुरानी स्मृति चिन्ह और हथियार देखने को मिलेंगे. इसके साथ ही कोलकाता शहर के इतिहास को भी यहां संजोकर रखा गया है.

कोलकाता का विक्टोरिया मेमोरियल हॉल सोमवार और प्रमुख पर्व – त्योहारों को छोड़ सभी दिन सुबह दस बजे से लेकर शाम 5 बजे तक खुला रहता है. यहां अंदर जाने के लिए 20 रुपए का इंट्री टिकट लगता है. टिकट लेकर हमलोग भी अंदर दाखिल हुए. यहां चारों ओर बिखरी हरियाली, फूल पौधों की खूबसूरती ने मन मोह लिया. बता दें कि 64 एकड़ जमीन में चारों ओर सिर्फ बगीचे ही हैं, जिसके बीच में मुख्य इमारत खड़ी है. इसके अंदर जाने के लिए भी हमें लाइन में लगना पड़ रहा था. अंदर की गैलरी में फोटो खींचने की मनाही है. सिक्यूरिटी गार्ड और कर्मचारियों की देख-रेख में पर्यटक अपनी आंखों से इतिहास को जीवंत होते देख रहे थे. यहां की अलग – अलग गैलरी को देखने के बाद मुझे लगा कि ये वो जगह है जहां आप हड़बड़ी में नहीं आ सकते, यहां घूमना है तो आपको इसे पर्याप्त समय देना होगा, तभी आप यहां से अपने साथ काफी कुछ जानकारियां भी ले जा पाएंगे.
खैर अंदर घूमने के बाद जब हम बाहर निकले तो काफी देर से पॉकेट में रखा मोबाइल भी बाहर निकल गया. और उसके बाद तो इतनी फोटोग्राफी हुई की पूछिए मत. सेल्फी और ग्रुप फोटो के साथ अपने चारों ओर बिखरी खूबसूरती को जमकर क्लिक किया. आपको बता दें कि Victoria Memorial Hall में घूमते हुए आप एयरटेल का फ्री इंटरनेट भी इस्तेमाल कर सकते हैं. यहां का पूरा कैंपस Wi Fi Zone में आता है. एक दिन में एक मोबाइल नंबर यूजर को आधे – आधे घंटे के दो सेशन में फ्री इन्टरनेट की सुविधा मिलती है.

विक्टोरिया मेमोरियल में अतीत की यात्रा करते – करते शाम गहराने लगी थी, यहां से अब हमलोग निकले मां काली के दर्शन को, जो कोलकाता शहर की संरक्षक देवी हैं. कालीघाट काली मंदिर सुबह 5 बजे से दोपहर 2 बजे तक और फिर शाम 5 बजे से रात साढ़े दस बजे तक श्रद्धालुओं के लिए खुला रहता है. ये काली मंदिर देश के 51 शक्ति पीठों में से एक है. कहा जाता है कि इसी कालीघाट पर मां सती के दाहिने पांव की चार उंगलियां गिरी थी. मंदिर के बाहर प्रसाद और फूल – मालाओं की कई दुकानें लगी थी. रास्ते में ही हमारे पीछे पूजा कराने और शीघ्र दर्शन कराने के नाम पर कई पंडे भी लग गए थे. उन सबों को अनदेखा कर हमलोग आगे बढ़ गए. प्रसाद और फूल लेकर मंदिर में दाखिल हुए, भीड़ और मंदिर के अंदर पंडों की ‘डिमांड’ के बीच पलभर के लिए ही मां काली के दर्शन हमें भी हो गए.
सुबह से अब रात हो चुकी थी और कोलकाता में हमारी घुमक्कड़ी लगातार जारी थी. मंदिर से निकलने के बाद अब बारी थी कोलकाता मेट्रो पर सफ़र करने की. जिसके भी मजे हमलोगों ने लिए. मेट्रो में बैठे – बैठे बस यही सोच रहा था कि वो दिन कब आएगा जब पटना मेट्रो भी बनकर तैयार हो जायेगा और फिर अपने शहर में भी हमलोग ऐसे ही मेट्रो का मजा ले पाएंगे. खैर दिल को दिलासा दिया कि पटना में मेट्रो का काम तो शुरू हो ही गया है, जल्द बन भी जायेगा. याद आया जब दिल्ली मेट्रो की सवारी कर रहा था, तो उस वक़्त पटना मेट्रो हमारे लिए किसी सपने जैसी बात थी. पर अब वो सपना अपने शहर में जल्द साकार हो रहा है.

खैर इतनी बातें सोचते – सोचते ही हमारी स्टेशन आ गई और फिर मेट्रो से बाहर निकल कर कोलकाता के बाजारों के चक्कर काटने लगे. जैसे – जैसे रात गहरा रही थी, वैसे – वैसे कोलकाता के बाजारों में भीड़ बढ़ती जा रही थी. कपड़े से लेकर कॉस्मेटिक सामानों के ढेर लगे हुए थे. मॉल में ऑफर्स की बहार थी तो लोकल बाजारों में सस्ते सामानों की लूट. हमलोगों ने भी यहां विंडो शॉपिंग की.
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लोकल बाजारों से गुजरते हुए प्रदीप जीजू ने हमें कोलकाता के एक से बढ़कर एक जायकों का भी स्वाद चखाया. देर रात तक तक हमलोग ऐसे ही कोलकाता की सड़कों पर घूमते रहे. अगले दिन सुबह – सुबह हमें दक्षिणेश्वर काली मंदिर, बेलूर मठ भी जाना था. इसलिए होटल पहुंचते ही मोबाइल में अलार्म लगाकर अपने कमरे में सोने चले गए. पर कोलकाता में ये हमारी पहली रात थी. नींद आंखों से कोसों दूर और मन इस ‘सिटी ऑफ़ जॉय’ की चमक – दमक में अब तक खोया था. बिस्तर पर आते ही शरीर थककर चूर हो गया था पर अंदर ही अंदर एक उत्साह था, स्वामी विवेकानंद की साधना स्थली देखने की, और इसी लालसा ने रातभर ठीक से सोने भी नहीं दिया…
कोलकाता का ये सफ़र अभी जारी है, अगले पोस्ट में हमारे साथ कीजिए दक्षिणेश्वर काली मंदिर, बेलूर मठ समेत कई और जगहों की यात्रा. वैसे ये पोस्ट आपको कैसा लगा, कमेंट बॉक्स में जरुर बताएं.

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