सोमनाथ मंदिर के दर्शन कर जब रात में हमलोग लौट रहे थे, तभी होटल कैंपस में मौजूद एक टूर एंड ट्रेवल्स वाले से जीजू ने आगे की यात्रा के लिए बात कर ली. जिसे सुबह आठ बजे इंडिका कार से हमलोगों को गिर जंगल और पोरबंदर घुमाते हुए द्वारिका ले जाने वाला था. 5000 में यह बुकिंग तय हुई. सुबह आठ बजे हमलोग बाई रोड भाया सासन गिर और पोरबंदर होते द्वारिका के लिए निकल गए.

यह सुबह काफी अच्छी रही हमलोगों के लिए. एक तो सोमनाथ की आरती में शरीक होने का मौका मिला फिर चढ़ते धूप की गर्माहट को बेअसर करता गाड़ी के अंदर एसी की ठंडक और जंगल में घुमने और सिंह को नजदीक से देखने के उत्साह ने सफ़र का मजा दोगुना कर दिया. ड्राईवर ने बताया कि हम तीन घंटे में सासन गिर पहुंच जायेंगे.  रास्ते में एक जगह थोड़ी देर रिफ्रेश होने के लिए हमलोगों ने नारियल पानी और उसकी गिरी खायी. फिर चल पड़े एशियाई शेरों के घर. गिर जंगल  दक्षिण-पश्चिम गुजरात में फैला 1,412 वर्ग किलोमीटर का विश्व प्रसिद्ध संरक्षित जंगल है. यहां एशियाई बब्बर शेर खुलेआम घूमते है और अपना शिकार करते हैं.

साल 2000 में इंटरनेशनल यूनियन फॉर कन्जर्वेशन ऑफ़ नेचर (आईयूसीएन) ने एशियाई शेरों को विलुब्त होने वाली प्रजाति की सूची में शामिल कर दिया था. वर्ष 1975 में जब गिर नेशनल पार्क बना तब इनकी प्रजाति समाप्त होने के कगार पर थी. लेकिन अब स्थिति पलट चुकी है. करीब 300 शेर यहां के टीक के जंगलों में और धूल भरे वातावरण में अपनी जिंदगी स्वछंद रूप से जी रहे हैं.

कुछ ही देर में जंगली इलाके को पार करते हुए रास्ते के दाएं-बाएं कई नील गाय और हिरणों का झुंड हमें दिखने लगा. सभी अपनी दुनिया में मग्न और बेपरवाह कुलांचे भर रहे थे. रास्ते के किनारे एक औरत जामुन बेच रही थी. ख़ुशी की फरमाइश हुई और गाड़ी रुक गयी. काले और बड़े जामुन का मजा लेते अब हमलोग गिर इंटरप्रिटेशन जोन तक पहुंच चुके थे.

यहां ड्राईवर ने बताया कि हमारी गाड़ी यही रहेगी. आगे जंगल में सरकारी बस से जाना होता है. गिर इंटरप्रिटेशन जोन को देवलिया सफारी पार्क भी कहा जाता है. यह पूरा क्षेत्र 412 हेक्टेयर में फैला है. शेर तो यहां का गौरव हैं ही, इसके अलावे भी यह क्षेत्र चीता, तेंदुआ, चीतल, हिरण, नील गाय, सांबर, जंगली सूअर और दुसरे जानवरों से भरा है. यह बुधवार को बंद रहता है. गिर राष्ट्रीय उद्यान, भारत की एक मात्र सफारी है जहां एशियाई शेर वास करते है. यहां सफारी का मजा लेने के लिए wwwww.girlion.in पर ऑनलाइन बुकिंग भी कर सकते हैं. सासन गिर के बारे में अगर आप और ज्यादा जानकारी लेना चाहते है तो इस टोल फ्री नंबर पर कॉल कर सकते हैं – 1800 200 5080.

आधे घंटे की सफारी का रेट यहां अलग अलग है. सप्ताह के चार दिन सोमवार, मंगलवार, गुरूवार और शुक्रवार को 150 रूपए है तो वहीँ वीकेंड (शनिवार व रविवार) को बढ़ कर 190 रुपये हो जाता है. काउंटर से जब जीजू टिकट लेकर आये तो उस पर लिखे बस न. के अनुसार हमलोग बस में दाखिल हुए. गाड़ी के अंदर पहले से ही कई लोग मौजूद थे. टिकट पर ही हमारा सीट नं. अंकित था, जिसके अनुसार हमलोग अपने अपने सीट पर बैठ गए और बस खुलने का इंतजार करने लगे. यहां चलने वाली बसें इको-फ्रेंडली होती है. जो केन्द्रीय नमक व समुद्री रसायन अनुसंधान संस्थान, (वैज्ञानिक तथा औद्योगिक अनुसंधान परिषद्) भावनगर की अंतर्राष्ट्रीय पेटेंट टेक्नोलॉजी द्वारा उत्पादित शुद्ध जेट्रोफा बायोडीजल से चलती है.

जैसे ही हमारी बस खुली और जंगल की ओर बढ़ने लगी, इसमें सवार सभी लोगों की नजरें बाहर टिक गयी. जैसे ही किसी को कोई जानवर दिखता, वह चिल्लाने लगता, बस वहां रुक जाती और अंदर से ही सारे लोग देखने और उसकी तस्वीर लेने लग जाते. हम लोग जानवरों को अच्छे से देख सके इसलिए बस की चाल भी धीमी थी. सबसे ज्यादा वहां हिरण ही नजर आ रहा था. फिर कहीं कहीं नील गाय भी दिखी.

जब और आगे बढे तो फाइनली एक जगह शेर दिखा. पेड़ की छाँव में वह अपने पूरे परिवार, जिसमें दो शेरनी और दो नन्हे शावक थे, उनके साथ सोया हुआ था. इसे देखते ही गाड़ी के अंदर बैठा हर कोई रोमांचित हो उठा. सबके कैमरे और मोबाइल के फ्लैश चमकने लगे. जीजू विडियो बनाने लगे तो स्नेहा अपने कैमरे से शेरों की दे दनादन कई सारी तस्वीरें बटोरने में लग गयी. तभी बस के ड्राईवर ने हम सभी का कैमरा बंद करवा दिया. बाहर देखा तो एक जीप थी जो उन सोये शेरों के इर्दगिर्द चक्कर लगा रही थी. तो इसलिए कैमरा बंद करवाया गया था कि कोई आराम करते शेरों को जगाने वाले उस जीप की विडियो या फोटो न ले लें. कुछ ही देर में शेर सहित पूरा परिवार उठ खड़ा हुआ.

शेर आदमियों की मौजूदगी से उतने प्रभावित नहीं होते जितना बाघ होते हैं. बाघ शर्मीले भी होते है और जल्दी नजर नहीं आते लेकिन यहां शेरों को आराम से देखा जा सकता है. काफी देर शेरों को निहारने उनकी एक एक हरकतों को समझने-देखने के बाद हम आगे चले. कुछ ही देर में चीता भी नजर आया. एक दो चीता पेड़ों पर लटका दिखा तो कुछ नीचे शिकार की तलाश में टहल रहा था. तेंदुआ भी पेड़ों के पीछे बैठ सुस्ता रहा था.

पहली बार ऐसे वन्य जीवों और वन्य जीवन से यह सीधा साक्षात्कार हो रहा था हम सबका. वैसे तो चिड़ियाघर में भी जानवर देखने को मिलते हैं, लेकिन उनके पिंजरे में रहने के कारण ऐसा अनुभव नहीं मिल पाता, यहां तो परिस्थितियां ही उलटी थी. वो खुले में आजाद अपने आवासीय परिसर में थे और हमलोग बस रूपी पिंजरे में कैद होकर उन्हें देख रहे थे. करीब आधा-पौने घंटे के बाद हमारी बस लौट आई. यहां बच्चों के लिए एक छोटा सा पार्क भी है जहां टंगे झूलों को देख हमेशा की तरह स्नेहा और ख़ुशी वहां झूलने के लिए मचल पड़ी. बच्चे ऐसे ही तो होते हैं. झूले उन्हें हमेशा अपनी ओर खींचते हैं, भले वो कहीं भी रहे. उन्हें इस बात से फर्क नहीं पड़ता. उन्हें तो बस कुछ वक़्त झूलने का आनंद लेना है. तो झुला देखते ही दौड़ती चली गयी उधर.

अब यहां के बाद हम पोरबंदर के लिए रवाना हुए. पोरबंदर सौराष्ट्र (गुजरात) के पश्चिम समुंद्र तट पर है. यह गांधी जी का जन्म स्थान है. इस कारण यहां उनके जीवन से जुड़े कई स्थान है, जिन्हें देखने के लिए पर्यटकों की भीड़ हमेशा लगी रहती है. वहीँ यह सुदामा की जन्म भूमि भी कहलाती है. वहीँ सुदामा जो भगवान कृष्ण के बाल सखा थे. इस कारण यह जगह सुदामापुरी के नाम से भी जाना जाता है. वहीँ सुदामा जी का एक मंदिर भी है यहां, जिसे सुदामा मंदिर कहते है.

गुजरात की चकाचौंध आधुनिकता देखने के बाद पोरबंदर का कस्बाई परिवेश देखना मन को आनंद दे जाता है. कीर्ति मंदिर यानि महात्मा गांधी जी का पुश्तैनी घर. पोरबंदर के माणक चौक पर घंटाघर के पास है. इनके घर से थोडा पहले ही एक जगह गाड़ी पार्क कर ड्राईवर ने हमें बताया कि यहां से सीधे ही बापू का घर है. वहां तक आपलोगों को पैदल जाना होगा.

कीर्ति मंदिर के अंदर जैसे ही दाखिल हुए सामने दिखी गांधी जी और कस्तूरबा की बड़ी सी तैलीय चित्र. तो पहले उनके दर्शन किये और फिर निकले उनका घर देखने. अंदर प्रवेश करते ही बाएं तरफ गांधी जी का तीन मंजिला पैतृक निवास है. यह मकान सन 1777 में इनके परदादा हरजीवन जी रहीदास जी गांधी ने वहां की एक स्थानीय महिला माणबाई से ख़रीदा था.

गांधी जी के दादा श्री उत्तम चंद जी ने कुछ परिवर्तन कर के इसे दो मंजिला बनाया. बाद में एक और मंजिल की वृद्धि हुई और इस प्रकार गांधीजी के जन्म समय पर 2 अक्टूबर 1869 में यह मकान तीन मंजिला था. इस में गलियारा सहित 22 कमरे है. जगह जगह दीवारों पर गांधी जी की उक्तियां, तस्वीरें और उनकी जीवनी प्रदर्शित है. कदम-कदम पर ऐसा लग रहा था गांधी जी स्वयं साथ चल रहे है. बातें कर रहे है. उनके घर में उनकी निशानियां उनके साथ होने का अहसास करा रही थी. वहां घूमते हुए काफी अच्छा लग रहा था. नीचे एक कमरे में जमीन पर बड़ा सा स्वस्तिक का निशान बना है. इसी जगह पर मां पुतलीबाई ने अपनी चौथी संतान के रूप में गांधी जी को जन्म दिया था. लकड़ी की संकरी छोटी सीढ़ियों से होते हुए, एक मोटी रस्सी के सहारे हमलोग उपरी मंजिल पर पहुंचे. जहां गांधी जी का अध्ययन कक्ष था. यहां इनके निवास स्थान पर हम लोगों ने कुछ देर वक़्त बिताया और गांधी जी की मौजूदगी को महसूस करने की कोशिश की.

कीर्ति मंदिर परिसर में ही प्रार्थना कक्ष के अलावे, गांधी को पढ़ने वालों के लिए गांधीवादी लाइब्रेरी भी है. वही कीर्ति मंदिर के पीछे कस्तूरबा का घर है. जब यहां से बाहर निकले तो ऐसे ही घूमते हुए आगे चौराहे तक बढ़ गए. एक जगह रास्ते में एक अजीब फल को देख हमसभी रुक गए. फल बेचने वाले ने उसका नाम सफ़ेद जामुन बताया. हम लोग भी उत्सुकता वश उस फल को देख रहे थे. दुकानदार ने सफ़ेद जामुन की कीमत 100 रूपए किलो बताई. टेस्ट के लिए एक पाव ख़रीदा. पर ख़ुशी को छोड़ किसी को यह फल पसंद नहीं आया. न मीठा लगा और न खट्टा, बिलकुल बेस्वाद. सिर्फ खस खस. फिर हमलोगों ने चीकू ख़रीदा. हां इस मीठे फल को सभी ने खूब खाया. गाड़ी के पास आये तो बगल में ही सोडा वाटर की दूकान थी. दोपहर का वक़्त हो चला था और पैदल चल कर हम लोग थोड़े थक भी गए थे तो यहां हर फ्लेवर को ट्राई करने लगे.

यहां घुमने के बाद फिर हमलोग द्वारिका के लिए चल दिए. पोरबंदर से द्वारिका की दुरी तक़रीबन 100 किलोमीटर है. यहां से आगे बढ़ने पर दो चीजें खूब देखने को मिली. रास्ते के किनारे समंदर हमारे विंडो साइड की खुबसूरती को बढ़ा रहा था तो जगह जगह पवन ऊर्जा उत्पन्न करने वाले बड़े बड़े पंखे देख ख़ुशी और स्नेहा उत्साहित थी. हवा की गति के अनुसार इसकी पंखियाँ कभी तेज घुमती तो कभी धीमी हो जा रही थी.

 

पोरबंदर से जैसे ही आगे बढे तो करीब 27 किलोमीटर आगे मूल द्वारिका मंदिर आया, लेकिन हमलोग यहां नहीं उतरे. हां इसके आगे हर्षद माता के मंदिर के पास ड्राईवर ने गाड़ी रोकी और हमलोग मंदिर के दर्शन करने अंदर चले गए.

मंदिर के बाहर ही रास्ते के एक ओर समंदर दिखा तो लगे हाथ समुंद्र – दर्शन भी हो गए. इसके बाद जो हमलोग वहां से चले तो अब सीधे द्वारिका भूमि पर ही हमने अपने कदम रखे. यहां पहुंचते-पहुंचते करीब चार बज ही गए थे.

द्वारिका में रुकने के लिए भी मौसा जी ने एक बढ़िया होटल हमें बताया था, हम सीधे वहीँ गए पर अफ़सोस वहां कोई भी एसी या डीलक्स कमरा खाली नहीं था. इसलिए और आगे द्वारिका शहर के अंदर आ गए. यही भद्र काली रोड पर तीन बत्ती चौराहे के पास मिलन होटल के सामने ड्राईवर ने अपनी गाड़ी खडी की और अंदर चल कर हमलोग होटल के अंदर रिसेप्शन पर गए. यहां एसी कमरा उपलब्ध था. एक रात के 1000 रूपए. रूम देखा तो ठीक ठाक ही लगा. कमरे में एक डबल बेड और एक सिंगल बेड लगा था. बाकी टीवी, एसी सभी मौजूद था ही. हां बाथरूम यहां वैसा नहीं था जो सोमनाथ में हमें मिला था. थोडा छोटा था. हमलोग थके तो थे ही, इसलिए इसे ही बुक कर लिया गया. ऊपर रूम में आते वक़्त जीजू ने होटल वाले को चाय के लिए आर्डर कर दिया. कमरे में घुसते ही हमलोग पहले तो एसी ऑन किया और बेड पर लेट गए. थोड़ी देर में ही चाय आई तब जाकर हल्का नास्ता हुआ. फिर प्लानिंग हुई द्वारिका मंदिर जाने की..

LEAVE A REPLY

Please enter your comment!
Please enter your name here