द्वारिका गुजरात के जामनगर जिले में पड़ता है. यहां हमलोग तीन बत्ती चौराहे के पास मिलन होटल में ठहरे थे. शाम में तैयार होकर करीब साढ़े सात बजे द्वारिका भ्रमण के लिए निकले. तय हुआ कि घूमकर लौटते वक़्त ही उधर से डिनर करते आना है. हालांकि द्वारिका शहर हमलोग के लिए नया थालेकिन भगवान कृष्ण की यह नगरी उतनी बड़ी नहीं थीहर रास्ता एक दुसरे से आकर मिल जाताचलते हुए एक जगह नजर पड़ी तो आश्चर्य में पड़ गए कि अरे यहां विश्वकर्मा धर्मशाला भी है. पहले से पता रहता तो यही रूम बुक करते. पर अब क्या फायदा. अंदर विश्वकर्मा भगवान की मूर्ति के दर्शन कर हमलोग आगे बढ़ गए.

सोमनाथ दर्शन के बाद अब वहां से करीब दो सौ किलोमीटर दूर द्वारिका की गलियों से गुजरते वक़्त मन उत्साहित था कि आखिर द्वारिका के दर्शन का भी सौभाग्य प्राप्त हो ही गया. इस नगरी को भगवान श्री कृष्ण ने उस वक़्त बसाया था जब वह मथुरा छोड़ कर यहां आये थे. वहीँ चार धामों में से एक धामसात मोक्षदायिनी पुरियों में से एक और आदि शंकराचार्य द्वारा चारों दिशाओं में स्थापित मठों में से एक श्री शारदा मठ द्वारिका में स्थित होने के कारण इसकी महत्ता और भी ज्यादा बढ़ जाती है.

तो यूं ही घूमते-फिरते सबसे पहले पहुँचे गोमती नदी और अरब सागरजिसे सिंधु सागर भी कहा जाता हैउसके संगम पर. हालांकि तब तक अँधेरा घिर आया था और सागर दिख भी नहीं रहा था लेकिन उसके लहरों की गर्जना बार बार हमें भयभीत कर रही थी. यहां गोमती नदी की सीढ़ियों पर खड़े उन लहरों से हमने काफी देर तक मजा किया. घाट पर कई मंदिर भी थे. हमलोग यहां ज्यादा देर रुके नहीं. सोचा सुबह फिर से आना तो है ही. तब यहां का नजारा भी देखेंगे और फोटोग्राफी तो होगी ही. 

इसके बाद हमलोगों ने द्वारिकाधीश मंदिर की ओर रुख किया.  भगवान कृष्ण के महल को देखने की काफी उत्कंठा थी. क्योंकि वास्तव में यह उनका महल हरि गृह’ ही थाजहां से वो अपना राज-पाठ चलाते थे. आज उसी जगह पर द्वारिकाधीश मंदिर खड़ा है. माना जाता है कि यह मंदिर 2500 साल पुराना है. इसे जगत मंदिर भी कहते हैं. अभी का यह द्वारिकाधीश मंदिर सोलहवीं शताब्दी में बनाया गया है. जबकि इससे पहले का जो मूल मंदिर था उसका निर्माण भगवान कृष्ण के प्रपौत्र राजा वज्रनाभ ने करवाया था. कहा जाता है भगवान विश्वकर्मा ने एक रात में ही इस मंदिर का निर्माण कर दिया था. मंदिर की निर्माण शैली देखने में बड़ी सुन्दर लगी. पांच मंजिले इस मंदिर को चुना और रेत से बनाया गया है. 72 स्तंभों पर निर्मित यह मंदिर 78.3 मीटर ऊंचा हैजिसके शिखर पर लगभग 84 फुट लम्बी ध्वजा फहराती रहती है. प्रतिदिन पांच बार मंदिर के शिखर पर लगी इस धर्म ध्वजा को बदला जाता है.

मंदिर की ओर जाने वाले रास्ते में कई छोटी-बड़ी दुकाने मिली. किसी में भगवान की मूर्तिकपड़े  और तस्वीरें मिल रही थी तो कही गुजरात की प्रसिद्ध चनिया चोलीलहंगेऔर वहां के पारंपरिक वस्त्र खूब बिक रहे थे. शंखमोतीमाला की भी दुकानें थी. इस कारण रास्ता थोडा संकरा और भीड़भाड़ वाला हो गया था. जब मंदिर के करीब पहुँचे तो वहां की सुन्दरता देख कर दंग रह गए. रात के वक़्त द्वारिकाधीश का यह मंदिर रंग बिरंगी रोशनियों से जगमगा रहा था. जब तक हमलोग यहां पहुँचे तब तक आरती समाप्त हो चुकी थी. लेकिन तब भी दर्शन करने वाले भक्तों की काफी भीड़ थी. यहां भी अपने साथ कोई सामान लेकर मंदिर नहीं जा सकतेहमलोगों ने सोचा अभी तो आरती खत्म हो गयी हैऔर कुछ देर में मंदिर के बंद होने का भी वक़्त हो जाएगा इसलिए अच्छा होगा कि सुबह आरती में ही शरीक हुआ जायेइसलिए बस बाहर से ही मंदिर के दर्शन कर लौट गए.

मंदिर सुबह 6 बजे से दोपहर 1 बजे तक खुली रहती है, उसके बाद इसे बंद कर दिया जाता है. शाम में इसके खुलने का समय 5बजे है और फिर 9 बजे इस मंदिर के किवाड़ बंद कर दिए जाते हैं.  यहां आपको ललाट पर बड़े बड़े चंदन टीका लगाये भगवान के कई तथाकथित भक्त पुजारी के रूप में मिलेंगे जो आपसे पैसे लेकर मंदिर के अंदर अपने कैद में रखी ‘मूर्तियों’ के दर्शन आनन-फानन में करा देते है. क्षमा कीजियेगा ‘मूर्ति’ शब्द इसलिए लिख रहा हूं कि मंदिरों में तो महज पत्थर की मूर्तियां रहती है. भगवान तो हर प्राणी के अंदर निवास करते हैं. इसलिए मैंने ऊपर यह लिखा कि भगवान कृष्ण के महल को देखने की उत्कंठा थी, न कि भगवान कृष्ण की मूर्ति को. उन्हें तो मैं इस संसार के हर प्राणी में देखता हूं. हां तो बाहर से ही मंदिर की सजावट देख हम सभी भाव विभोर हो गए थे. कुछ देर वहां रुक कर फोटो खिचवायें और फिर वापस निकल पड़े.

अब हमारे पेट पूजा की बारी थी. लौटते वक़्त तीन बत्ती चौराहे के पास ही द्वारकेश भोजनालय हमें नजर आया. यहां 55 रूपए थाली मिल रहा था. खाने में चावल, दाल, रोटी, सब्जी, भुजिया, अचार था. हमें लग रहा था कि पता नहीं खाना कैसा होगा. क्योंकि यहां का हर व्यंजन ही मीठापन लिए होता है. लेकिन यहाँ का भोजन हमें ठीक ठाक लगा. खारे पानी के कारण यहां भी हम लोगों ने दो लीटर का बोतल वाला पानी खाने के साथ आर्डर कर दिया. वाकई खाना बढ़िया था. 55 रूपए में जितनी मर्जी उतनी खाओ. लेकिन हमारे थाली में जितना परोसा गया था उतने में ही हमारा पेट भर चुका था. इसलिए डिनर कर अब हमलोग वापस होटल आ गए.

होटल के स्टाफ ने बताया कि अगर आप लोग द्वारिका के आस पास के मंदिरों में घूमना चाहते हैं तो यही से दिन में दो बार बस खुलती है. एक सुबह बजे और दूसरा दोपहर बजे. आप जिस वक़्त घूमना चाहते है बता दीजियेअभी यही से बस में आपका टिकट बुक हो जायेगा. तब हमलोगों ने सोचा कि सुबह तो द्वारिकाधीश मंदिर घूमना है. इसलिए दोपहर वाले बस से हमलोग घुमने जायेलौटते वक़्त 7-8 बज ही जाएगाऐसे में रात में हमारी ट्रेन भी है तो यही से डिनर कर हमलोग अपनी गाड़ी भी पकड़ लेंगे. तो यह फाइनल हो गया की दोपहर तक हमलोग द्वारिका नगर घूमेंगे और दोपहर बजे बस से द्वारिका के निकटवर्ती स्थानों के दर्शन करने जायेंगे. 80 रूपए प्रति व्यक्ति के हिसाब से 320 रूपए में हमारी चार सीट बुक हो गयी. अब मुश्किल यह था कि होटल का चेक आउट टाइम सुबह दस बजे थाऐसे में हमारी समस्या अपने भारी भरकम सामानों को लेकर थी. आखिर इतना लगेज लेकर कहां-कहां घूमेंगे. तो इसके लिए जीजू ने होटल वाले से बात कर ली की सामान को होटल में ही छोड़ देंगेजब घूम कर आयेंगे तो उस वक़्त ले लेंगे. तो इसतरह हो गया प्रोब्लम सोल्वड. अब अपने कमरे में आ कर निश्चिंत होकर सो गए. कृष्ण की नगरी द्वारिका में यह हमारी पहली रात थी. नींद भी जम कर आईसुबह कब हो गयी पता भी नहीं चला. दी ने उठाया तो देखा की सब नहा कर तैयार हो रहे है. फिर जल्दी जल्दी तैयार होकर हमलोगों ने होटल छोड़ दिया.

द्वारिका में आपको गौ माता खूब मिलेंगी. यहां गायें हर गलीबाजारचौराहेमंदिर यहां तक की रेलवे स्टेशन के ट्रैक पर घुमती नजर आएगी. दुकानों के सामने भी अगर कभी गाय आ जाती है तो उन्हें बड़े प्यार से खाने की वस्तु देकर विदा करते हैं. यह देख कर अच्छा लगा क्योंकि अपने यहां तो उन्हें दुत्कार कर भगा दिया जाता है. ऐसे ही होटल से आगे कुछ दूर गायों का एक झुंड मिला. वहां चारा बेचते एक ठेला थाजहां से दी ने चारा खरीद कर गायों को चारा  खिलाया. फिर हम सभी अरेबियन सी की ओर बढे. यहाँ अरब सागर की उंची उठती लहरें देख हम सभी रोमांचित हो उठे. पानी में इतना उफान था की हम सभी दूर खड़े थे तब भी पानी की फुहारें हमारी ओर आ रही थी. यहाँ का दृश्य देखने योग्य था.

पत्थरों पर जब दूर समुन्द्र से आती खारे पानी की लहरें टकराती तो बड़ी भयंकर आवाज निकलती. यहाँ पत्थरों पर रेंगते कई बड़े बड़े केंकड़े मिले. यहाँ से लाइट हाउस भी नजर आ रहा था. काफी देर हमलोग यहाँ रुके और फोटोग्राफी की. इधर ऊंट की सवारी का भी आप आनंद ले सकते है. यहाँ से किनारे किनारे आगे बढ़ने पर गोमती नदी भी मिल जाती है. द्वारिकाधीश मंदिर सागर और गोमती नदी के संगम के किनारे ही है. मंदिर में जाने के दो द्वार है. स्वर्ग द्वार और मोक्ष द्वार. कई लोग मंदिर के दक्षिण में गोमती धारा पर बने चक्रतीर्थ घाट पर नहा कर फिर यहाँ से56 सीढियां चढ़ कर स्वर्ग द्वार से मंदिर में प्रवेश करते है. समुंद्र के किनारे बहुत सारे शंखसीपियां और मोती मिल रहे थे. देखने में ये बहुत सुन्दर लग रहे थे. यहाँ सबने दही की लस्सी पी और मंदिर के मुख्य द्वार यानि उतर दिशा में पड़ने वाले मोक्ष द्वार की ओर बढ़ गए.

रात में मंदिर रंगीन रौशनियों से जगमगा रहा था तो दिन में भी इसकी सुन्दरता देखने लायक थी. यहाँ बैगइलेक्ट्रॉनिक आइटम्स और चप्पल-जूता को काउंटर पर जमा कर मंदिर के अन्दर जाने वाली लाइन में लग गए. जीजू तब तक प्रसाद काउंटर से प्रसाद लेकर लाइन में लग चुके थे. यहाँ भी गेट के पास सुरक्षाकर्मी मौजूद थे जो हर अन्दर जाने वाले की जांच कर रहे थे. हमलोग अच्छे वक़्त पर मंदिर पहुंचे थे क्योंकि अभी भगवान् की श्रृंगार आरती की तैयारी ही चल रही थी. द्वारिकाधीश मंदिर में दिन में चार बार आरती होती है. पहले सुबह 6:30 बजे मंगला आरती होती है फिर 10:30 बजे श्रृंगार आरती का वक़्त होता है. शाम में 7:30 बजे संध्या आरती फिर उसके बाद 8:30 बजे शयन आरती होती है.

अन्दर द्वारिकाधीश की काले पत्थरों से निर्मित 2.25 फीट की मूर्ति थी जो राजसी पौशाक और फूलों से सजी थी. इनके अलावे वहां भोले नाथगणेश जीमाता जगदंबा आदि देवी देवताओं के भी मंदिर थे. कृष्ण की रानियों में रुक्मणी को छोड़ कर सत्यभामाजम्बुवंती आदि की मूर्तियाँ भी विराजमान थी. रुक्मणी देवी का मंदिर द्वारिका से बाहर है. इसका भी एक कारण है जो मैं आपको आगे बताऊंगा. आरती के वक़्त भीड़ काफी हो गयी थी. लेकिन आरती से कुछ देर पहले आने के कारण मैं और जीजू आगे खड़े थे और द्वारिकाधीश की मूरत को निहार रहे थे.

हां आरती के वक़्त बार बार ध्यान उस पंडित पर भी जा रहा था जो आरती कर रहा था और साथ में गुटखा भी चबा रहा था इस कारण बार बार उसका पीक मुंह से बाहर गिर रहा था. द्वारिकाधीश का यह महल अन्दर से काफी बड़ा और विशाल था. यही पूर्व दिशा में शंकराचार्य द्वारा निर्मित शारदा पीठ भी देखा. यहाँ द्वारिका में लोग भगवान् कृष्ण को द्वारिकाधीश के नाम से ही पूजते हैं.

 

लोगों का कहना है कि हम अपने राजा को उनके नाम से संबोधित नहीं करते. कृष्ण द्वारिका के राजा थे इसलिए यहाँ हर जगह आपको यहाँ के स्थानीय लोगों से द्वारिकाधीश/द्वारकेश/द्वारकानाथ या द्वारिकापति ही सुनने को मिलेगा. दुकानों के नाम भी ऐसे ही होते है यहाँ. कुछ देर मंदिर के अन्दर रहने के बाद हमलोग बाहर आ गए. मंदिर के बाहरी परिसर में लाकर रूम के पास ठंडा पानी पिलाने की व्यवस्था है. पानी की बर्बादी न हो इसलिए छोटे छोटे गिलासों में थोड़ा थोड़ा पानी भर कर टेबल पर रख दिया जाता है. गिलास उठाते वक़्त साथ में यह हिदायत भी कि यह पानी सिर्फ पीने के लिए है. हाथ या मुंह धोने के लिए नल का पानी प्रयोग करें. मंदिर के अन्दर फोटो तो नहीं ले सका इसलिए बाहर हमने कई फोटो और विडियो बनाये.

मंदिर से लौटते वक़्त रास्ते में पड़ने वाले बाजारों से गुजर रहे थे तो वहां के दुकानों का भी जायजा लिया. एक दूकान से नीलू दी और जीजू ने सबके लिए शोपिंग की. द्वारिकाधीश की मूर्तिकपड़े पर बनी उनकी तस्वीर और भी न जाने क्या क्या. सब कुछ लेकर दुकान से बाहर निकले तो बारी आई खाने की. भूख बड़ी जोरों की लगी हुई थी इसलिए रास्ते में ही एक होटल देखा और अन्दर चले आये. यहाँ हम सब ने आलू पराठा और दही खाया. भर पेट खाना खाकर अब हमलोग फिर से तैयार हो गए अपनी अगली यात्रा के लिए. अब हमें रुक्मणी मंदिर, गोपी तालाब, भगवन शिव के बारह ज्योतिर्लिंग में से एक नागेश्वरज्योतिर्लिंग मंदिर और बेट/भेंट द्वारिका घुमने जाना था.

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