पिछले पोस्ट यानि गुजरात यात्रा के छठें पड़ाव में आपने हमारी वांकानेर और सूरत भ्रमण के बारे में पढ़ा. अब सूरत से हमलोग अपनी यात्रा को विस्तार देते एक दिन के लिए सुबह-सुबह दमन के लिए निकले. निकलते वक़्त सुबह तेज बारिश होने लगी थी. पहली बार सूरत की बारिश का मजा लेने का मौका मिला. गाड़ी की खिड़की से बाहर शहर का आम जीवन नजर आ रहा था जो बरसात से भींगते-बचते इधर से उधर भागता फिर रहा था.

बरसती बूंदों के साथ चल रही ठंडी हवाओं ने मौसम को और सुहावना बना दिया था. इस कारण हमारे सफ़र का उत्साह भी दोगुना हो चला. इस बीच ठंड भरे मौसम के कारण गर्म गर्म चाय की तलब होने लगी. जब हमने अपनी इच्छा ड्राईवर से व्यक्त की तो उसने एन. एच. 8 पर एक होटल में गाड़ी पार्क कर दी. वहां हमसभी ने गरमागरम चाय का मजा लिया. चाय बड़ी स्वादिष्ट थी और हो भी क्यों न, आखिर 20 रूपए प्रति कप जो मिली थी. रिफ्रेश होकर हमलोग पुनः दमन की ओर बढ़ चले.

चलते चलते करीब 2000 साल से भी अधिक की समृद्ध ऐतिहासिक विरासत वाले इस प्रदेश के बारे में कई जानकारियाँ याद आने लगी. दमन और दीव भारत का केंद्रशासित प्रदेश है. इसकी राजधानी सिलवासा है. यह गुजरात के वापी शहर के निकट 72 वर्ग किलोमीटर में फैला है. पहले यह पुर्तगालियों के अधीन था. दमन के अतीत पर एक नजर डालें तो पहली बार 1523 में पुर्तगालियों ने दमन में प्रवेश किया.

पुर्तगाल का एक व्यापारी डियागो डि मेलो का जहाज समुंद्री तूफ़ान झेलते झेलते दमन के किनारे पहुंचा. इस तरह उसने यहां एक नए स्थान को देखा और फिर बाद में पुर्तगालियों ने यहाँ साढ़े चार सौ वर्ष तक राज किया. देश जब आजाद हुआ उसके बहुत बाद तक भी यहां पुर्तगालियों ने शासन किया. जब 1961 ई. में गोवा को पुर्तगालियों से आजाद कराया गया तो उस वक़्त दमन को भी अपने देश का हिस्सा बना दिया गया. फिर 30 मई 1987ई. के दिन जब गोवा को देश का एक राज्य बनाया गया तो उसके बाद दमन और दीव को भी केंद्रशासित प्रदेश होने का दर्जा मिला. अब वर्तमान दमन को देखें तो इसका नाम सुनते ही सबसे पहले हमारे जेहन में जो आता है, वह है यहां की फाइव स्टार होटल्स, रिजोर्ट्स, जिम, स्पा सेंटर, नाईट क्लब, चर्च और सबसे ज्यादा यहाँ के समुंदरी तट. यहां की ऐसी खूबसूरती ही सैलानियों को अपनी ओर ज्यादा खींचती है. दमन में आपको यूरोप और भारतीय दोनों परम्पराओं का सांस्कृतिक स्वरुप नजर आएगा. वैसे तो दमन और दीव, पढ़ने-सुनने में यह दोनों स्थान आसपास लगते है पर वास्तविकता यह है की इनका प्रशासन तो एक ही है लेकिन इन दोनों के बीच करीब 700 किलोमीटर की दूरी है. इसलिए हमलोगों ने दीव जाना छोड़ सिर्फ दमन के दामन में ही पूरा दिन गुजारने का निश्चय किया.

‘दमन गंगा नदी’ इस केंद्रशासित प्रदेश को दो भागो, नानी दमन तथा मोटी दमन नामक दो शहरों में बांटती है. दरअसल गुजराती में ‘नानी’ का मतलब ‘छोटी’ होता है और ‘मोटी’ का अर्थ ‘बड़ा’. इसलिए यहां नानी दमन एक छोटा शहर है, जबकि मोटी दमन शहर का एक बड़ा इलाका है. यहां जानकारी के लिए बता दूं इसी नानी दमन और मोटी दमन के बीच में एक पुल दमन गंगा नदी पर बनाया गया है. जब यह पुल बना था, उस वक़्त इसका उद्घाटन तत्कालीन पीएम राजीव गाँधी से करवाने की योजना थी, लेकिन जब उन्होंने इसके लिए समय नहीं दिया तो यहां की जनता ने खुद यह पुल चालू कर दिया. इस पुल का नाम राजीव गांधी सेतु है.

दमन में घुमने के लिए बहुत कुछ है. यहां मोटी दमन में पुराने चर्च मिलेंगे. इनमें 1603 ई. में निर्मित ‘कैथेडरल बोल जेसू’ चर्च प्रमुख है. यहां की दीवारों पर इसा मसीह की जिन्दगी से जुडी कई बेहतरीन चित्रकारी और नक्काशियां की हुई है. पास में ही सत्य सागर गार्डन भी है. वहीँ नानी दमन में सेंट जैरोम का किला है जिसका निर्माण 1614 से 1627 के बीच हुआ था. इस किले को मुगलों के आक्रमण से बचने के लिए बनाया गया था.

हालाँकि हमारी गाड़ी इन जगहों में से कहीं नहीं रुकी. दमन में हम सिर्फ एक ही जगह गए और वह जगह इतनी मजेदार और मस्ती वाली थी कि सारा दिन हमने वहीँ बिताया. वह जगह था अरब सागर का किनारा. दमन में दो बीच है. एक जैमपोर बीच और दूसरा देवका बीच. जैमपोरे बीच नानी दमन में है. जबकि दमन से पांच किलोमीटर उत्तर में देवका बीच है. हमारी गाड़ी यहीं आ कर लगी. बीच पर जाने से पहले पानी में ख़राब हो जाने के डर से अपने जूते, मोबाइल, ब्लू टूथ डिवाइस, घड़ी, आदि सारी चीजें उतार कर गाड़ी में ही रख दिया. पर हां कैमरे को अपने साथ रखना नहीं भूला. इसके बाद समुंद्र में नहाने के लिए टॉवल और कपड़ों को लेकर तैयार हो गए.

तब तक जीजू देवका बीच घुमने के लिए टिकट ले आये. यहां बड़ों के लिए 10 और पांच साल से 12 साल के बच्चों के लिए टिकट का दाम पांच रूपए है. इतनी खुबसूरत जगह पर आकर भला तस्वीरें न ले तो फिर यहां आना ही व्यर्थ है. इसलिए फोटोग्राफी के लिए 10 रूपए का टिकट भी कराया गया. मेन गेट से अन्दर आते ही चिल्ड्रेन पार्क मिला. जिससे होते हुए हम सभी सागर के तट पर पहुंचे. क्या अद्भुत नजारा था. प्राकृतिक सौन्दर्य से परिपूर्ण ऐसी जगह मैं पहली बार देख रहा था. अरब सागर से आती तेज लहरें बार बार दमन की धरती को छू कर वापस सागर में विलीन हो जा रही थी. बच्चे तो अथाह जल राशि देख पानी में डूबकी लगाने को बेताब थे.

यहां बीच के किनारे कई झोपड़ीनुमा होटल थे, जिसके बाहर प्लास्टिक की कई कुर्सियां लगी थी. ऐसे ही एक झोपड़ी में हमने भी अपना सामान रखा. वहां एक औरत थी जिसे सभी ‘मौसी’ कह कर संबोधित कर रहे थे उसे चिकन फ्राई करने का ऑर्डर दिया. यहां हमने अपने कपड़े उतार कर कुर्सी पर रखे और निकल पड़े सागर की ओर.

किनारे में खड़ा होने में भी बड़ा जोर लग रहा था. लहरें अपनी तेज बहाव से हमें संभलने का मौका ही नहीं दे रही थी. किनारे कई पत्थर थे जिनके ओट का सहारा लेकर हम सबने वहां खूब मस्ती की. तट के काले बालुओं को देख बच्चों की आंखों में चमक आ गयी. वो वहां के बालुओं पर घर बनाने लगे. लेकिन जब जब लहरें आती उनके घर को भी अपने साथ बहा ले जाती. जिसे देख बड़े हँसते तो बच्चे मायूस हो जाते, लेकिन फिर दोबारा जुट जाते अपने घर बनाने में. यहां एक चीज और उन्हें आकर्षित कर रही थी जो थे तट पर बिखरे चारों तरफ गोल व रंग-विरंगे पत्थर. जिन्हें चुन कर सभी अपने बैग में रखते जा रहे थे.

बीच पर ‘पीने’ की पूरी सुविधा है. हो भी क्यों न, लोग यहां खास कर इसी मकसद से आते है. गुजरात में ड्रिंकिंग पर पूरी तरह पाबन्दी है. इसलिए लोग वीकेंड एन्जॉय करने यहां आते है. लेकिन एक बात बुरी लगी कि तट पर शीशे की टूटी बोतलें यूं ही इधर उधर पड़ी थी. यहां नहाने वाले नंगे पांव चलते है जिससे पैरों में वह चुभ जाने का डर होता है. किनारे पर घुड़सवारी का भी आनंद उठा सकते है.

सागर में नहाने का सुख ले ही रहे थे कि इसी बीच बारिश भी होने लगी. यानि मस्ती डबल हो गयी हमारी. जल्दी से कैमरे को बचाया और फिर खुद को छोड़ दिया नमकीन और बरसाती पानी के बीच. अरब सागर में नहाते हुए हमलोग काफी दूर तक चले गए. पर परवाह किसे थी. तट काफी पथरीला था, इस कारण जब विशाल लहरें अपनी पूरी वेग से आती तो हम लोग चट्टानों के पीछे हो जाते. पानी के अन्दर केंकड़े का भी डर लग रहा था कि कहीं पैरों को काट न ले. लेकिन ऐसा कुछ नहीं हुआ.

अरब सागर की अपार-अगाध जलराशि के बीच रह कर यहां बह रही ठंडी हवा को महसूस करते, हवाओं के साथ झूमते नारियल के पेड़ों को देखते, दूर समुंद्र से होकर आती जोरदार लहरों से टकराते और ऊपर आकाश में इठलाते बादलों को निहारते वक़्त का जरा भी ख्याल नहीं रहा. मस्ती के ये पल रेत समान मुट्ठी से निकलते जा रहे थे. काफी देर के बाद जब समुंद्र से बाहर निकले तो शरीर नमकीन पानी में रहने की वजह से चिपचिपा सा लगने लगा था. तब उस झोंपड़ी की ‘मौसी’ ने एक बाल्टी पानी दिया जिससे हमलोगों ने उस नमकीनियत को धोया. नहाने के बाद भूख सी लगने लगी थी. तब तक हमारा चिकन फ्राई और फिश भी तैयार हो गया था. हालांकि हमारी भूख उससे नहीं मिटने वाली थी इसलिए सोचा कि खाना वापस लौटते वक़्त किसी रेस्टुरेंट में खा लिया जाएगा. तट के किनारे कुर्सी पर बैठ कर खाते वक़्त पूरे बीच को देखना मन को बड़ा सुकून दे रहा था. यहां चारों ओर सिर्फ खूबसूरती ही खूबसूरती नजर आती है. प्रकृति के इन बेहतरीन नजारों के साथ किनारे पर बनी झोंपड़ी में बैठ कर यहां के लजीज समुंद्री व्यंजनों का लुत्फ़ उठाने का एक अलग ही सुख है, जो हमलोगों ने वहां महसूस किया.

अब बारी थी हमारी लौटने की. अरब सागर के किनारे बिताये इन लम्हों को तस्वीरों में कैद कर हम दमन से वापस सूरत की ओर निकल पड़े. रास्ते में चलते हुए दूर से सागर दिखाई दे रहा था. बार-बार गरजती उसकी लहरें हमें सुनाई पड़ रही थी. मानों हमें फिर से आने का न्योता दे रहा हो. क्या पता पटना से इतनी दूर दमन आने का मौका फिर मिलेगा या नहीं, लेकिन जाते जाते अरब सागर से हमारी मुलाकात एक बार फिर होने वाली थी. दमन में नहीं बल्कि कही और. कहां यह अभी नहीं बताऊंगा. बस अगले पोस्ट का इंतजार करिए.

 

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