राम मंदिर पर फैसले के बाद एक ओर जहां लोगों में खुशियां छाई थी, तो वहीं कई लोग ऐसे भी थे जो इस मौके पर रामलला के दर्शन का परम सौभाग्य पाना चाहते थे. पटना के कारोबारियों का भी एक दल इसमें शामिल था. अयोध्या पर आये ‘सुप्रीम’ फैसले के बाद पटना के बिजनेसमैन अनिल विश्वकर्मा भी अपने दोस्तों के साथ अयोध्या के सफ़र पर निकल गए थे. उन्होंने पटना से अयोध्या की ये यात्रा हिंदी ट्रेवल ब्लॉग से शेयर की और बताया कि फैसले के बाद अब अयोध्या का माहौल कैसा है, मंदिरों में कितनी भीड़ बढ़ गयी है. पढ़िए कैसा रहा अयोध्या सफ़र का उनका अनुभव, उनके शब्दों में…

पिछले कई सालों से जिसका बेसब्री से इंतजार कर रहा था, आख़िरकार 134 साल पुराने अयोध्या पर वो फैसला आ ही गया. सुप्रीम कोर्ट के इस ऐतिहासिक फैसले के बाद तो रामलला के दर्शन करना तो बनता ही है, ऐसे में पटना से अपने तीन दोस्तों धर्मविजय नाथ, रंजन चौधरी और अशोक गुप्ता के साथ मैं भी निकल पड़ा अयोध्या शहर की ओर.

हमारा रिजर्वेशन पटना कोटा एक्सप्रेस ट्रेन में था. ये ट्रेन पटना जंक्शन से सुबह साढ़े 11 बजे खुलती है और दानापुर, बिहटा, आरा, डुमरांव, बक्सर, मुग़लसराय, जिसे अब पंडित दीन दयाल उपाध्याय स्टेशन कहा जाता है, से होते हुए वाराणसी, जौनपुर पार करते शाम पौने आठ बजे अयोध्या पहुंचती है. इस ट्रेन को पकड़ने के लिए हम सभी सुबह पौने 11 बजे ही पटना जंक्शन पहुंच चुके थे. रामलला के दर्शन का उत्साह था, जैसे ही ट्रेन प्लेटफार्म पर लगी, बस फिर क्या था, जय श्रीराम के नारे लगाते अपनी बोगी में सवार हो गए. अपने नियत समय पर ट्रेन खुली, तबतक हमलोग भी अपनी सीटों पर आसनी जमा चुके थे. ट्रेन की ये यात्रा दोस्तों संग शुरू हो चुकी थी. अब हमारे पास करीब आठ घंटों का समय था. और उसके बाद हम देश के सबसे प्राचीन स्थल और भगवान राम की जन्म स्थली अयोध्या में कदम रखने वाले थे. अयोध्या नगरी हिन्दुओं के 7 सबसे पवित्र नगरों (मथुरा, हरिद्वार, काशी, कांचीपुरम, उज्जैन, अयोध्या और द्वारिका) में से एक है. ये शहर फैजाबाद जिले में सरयू नदी के तट पर स्थित है.

शाम में हमलोग फैजाबाद स्टेशन उतरे, यहां से ऑटो लेकर रकाबगंज पहुंचे. यहां हमलोगों ने पहले से ही ओयो मोबाइल एप के माध्यम से होटल सिटी इन में कमरा बुक कर रखा था. रूम में पहुंचते ही सबसे पहले हमलोगों ने अपना सामान रखा और फ्रेश होने चले गए. बाथरूम से निकलते ही दिनभर की थकान भी उतर गई थी. और अब पेट में चूहे भी कूदने लगे थे. रात में बाहर सड़कों पर निकले तो अब भी काफी चहल पहल दिख रही थी. आखिर हो भी क्यों न, पिछले कई सालों से टेंट में रह रहे रामलला के दर्शन – पूजन का उत्साह कोर्ट से आए फैसले के बाद लोगों में साफ़ देखा जा रहा था. उनलोगों की भीड़ में हमलोग भी शामिल थे. विश्वास ही नहीं हो रहा था, अपने आराध्य की नगरी में आने की सालों से जो मन में कामना थी, वो साकार हो गई थी. सुबह रामलला के दर्शन करने थे. मंदिरों में जाना था, ऐसे में ये रात भी बड़ी लंबी बीत रही थी, आस्था से अभिभूत ये मन तो बेसब्री से सुबह होने का इंतजार कर रहा था. जैसे – तैसे ये रात कटी और फिर सुबह होते ही हम तैयार हो चुके थे, अयोध्या के मंदिरों के चक्कर लगाने. फ़ैजाबाद से हमें सबसे पहले अयोध्या आना था.

आपको बता दें कि अयोध्या और फैजाबाद दोनों दो शहर हैं. फ़ैजाबाद से अयोध्या करीब 4 – 5  किलोमीटर की दूरी पर स्थित है. फ़ैजाबाद शहर को अवध के पहले नवाब सादात अली खान ने 1722 ई. को बसाया था, और इसे अवध की पहली राजधानी बनाया था. बाद में अंग्रेजों ने इस शहर को मुख्यालय बनाकर फ़ैजाबाद जिले का निर्माण किया और अयोध्या को भी इसमें शामिल कर लिया. वर्तमान में अब यूपी के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने फ़ैजाबाद जिले का नाम बदल कर अयोध्या कर दिया है. फ़ैजाबाद शहर भी काफी खुबसूरत शहर है, इसे अयोध्या का जुड़वां शहर भी कहा जाता है.

फ़ैजाबाद से अयोध्या जाने के लिए जब हम बाहर सड़क पर आए तो पता चला ऑटो वहां से थोड़ी दूर आगे चौराहे पर मिलेगी. पर उसी वक़्त हमारे सामने एक ई – रिक्शा वाला आया, जिसे हमलोगों ने सौ रुपए में बुक कर लिया जो हमें राम जन्म भूमि चौक ले जाकर छोड़ दिया. अयोध्या में इतने मंदिर हैं कि इस शहर को मंदिरों का भी शहर कहा जाता है. अब एक दिन में सभी मंदिरों का दर्शन नहीं हो सकता इसलिए हमलोग यहां के कुछ मुख्य मंदिरों में ही घूमे.

अयोध्या राम जन्म भूमि चौक पहुंचते – पहुंचते करीब साढ़े 11 बज गया था. यहां आने पर पता चला कि राम जन्म भूमि का दर्शन 11 बजे से दोपहर एक बजे तक बंद रहता है. ये जो समय है वो राम लला के भोजन और उनके विश्राम का होता है. ऐसे में हमलोगों ने सोचा कि पहले हनुमान गढ़ी मंदिर का दर्शन कर लिया जाए, क्योंकि वो भी 12 बजे बंद हो जाता है. इसलिए जल्दी – जल्दी हमलोगों ने हनुमान गढ़ी मंदिर के मुख्य द्वार से ही शुद्ध घी का बेसन लड्डू और फूल माला लेकर लाइन में लग गए.

इस मंदिर को अयोध्या के सबसे प्रमुख मंदिरों में से एक माना जाता है. अयोध्या रेलवे स्टेशन से ये एक किलोमीटर की दूरी पर स्थित है. ऐसा माना जाता है कि जब भगवान राम सरयू नदी में समाधि लेने जा रहे थे तब उन्होंने अपने परम भक्त हनुमान को बुलाया और उन्हें अयोध्या की सुरक्षा की जिम्मेदारी सौंपी. हनुमान जी भी अयोध्या पर नजर रखने के लिए एक पहाड़ पर बैठ गए. माना जाता है कि उसी पहाड़ पर हनुमान गढ़ी मंदिर बनाया गया है.  यहां 76 सीढ़ियों का सफ़र तय करके भक्त पवनपुत्र के सबसे छोटे रूप का दर्शन करते हैं. हमलोग भी 12 बजे से पहले इस मंदिर के अंदर दाखिल हो गए थे और किस्मत तो देखिए, कुछ ही मिनटों में मंदिर का गेट भी बंद हो गया. हालांकि मंदिर के अंदर अभी भी श्रद्धालुओं की भीड़ काफी थी. लेकिन गेट बंद होने के कारण कुछ ही देर में मंदिर के अन्दर लोगों की भीड़ कम होने लगी. जिसके बाद हमलोगों ने बाल हनुमान का जी भरकर दर्शन किया. मंदिर के चारों ओर परिक्रमा भी की. पूजा – पाठ के साथ हमारी फोटोग्राफी भी चलती रही. अच्छी बात यह थी कि मंदिर में फोटो लेने की मनाही नहीं थी. भगवान के दर्शन करने के बाद हमलोग पीछे के निकास रास्ते से बाहर आ गए. हनुमान गढ़ी मंदिर के सामने छत पर भी हमलोग गए. अगर आप यहां आ रहे हैं तो मंदिर के छत पर भी जरुर जाइएगा. यहां से आपको पूरे अयोध्या शहर का खुबसूरत नजारा देखने को मिलेगा.

हनुमान गढ़ी मंदिर के बाद अब हमें रामलला के दर्शन करने थे. वहीं से दस मिनट की दूरी पर गली से गुजरते हुए हमलोग राम जन्म भूमि के मुख्य द्वार तक पहुंचे. यहां आने पर मालूम हुआ कि मंदिर के अंदर आप किसी तरह का कोई सामान नहीं ले जा सकते. मुख्य द्वार के पास ही आपको कई दुकानों में प्राइवेट क्लॉक रूम मिलेंगे. एक दुकान में हमलोगों ने भी अपना सामान जैसे मोबाइल, घडी, कैमरा, पर्स, कंघी आदि जमा करवाया, फिर मंदिर के गेट पर लगे लंबी लाइनों का हम भी हिस्सा हो गए.

धीरे – धीरे चार – पांच सुरक्षा चेक पोस्ट से गुजरते हुए हमारी लाइन आगे बढ़ रही थी. कुछ ही दूरी के बाद एक जालनुमा रास्ता मिला, जिसके अंदर हमलोग दाखिल हो गए. जाल के बाहर देखा तो सुरक्षा के खूब कड़े इंतजाम थे, हर तरफ सीआरपीएफ के जवानों ने मोर्चा संभाला हुआ था. इधर राम लला को देखने का उत्साह हम राम भक्तों में भी खूब था. हमलोग भी उतने ही जोश में जय श्रीराम के नारे लगाते  आगे बढ़ रहे थे. कुछ दूर आगे जाने पर हमें राम चबूतरा दिखा. कहा जाता है कि भगवान राम बचपन में उसी चबूतरे पर खेला करते थे. उस चबूतरे को नमन करते हुए हमारी नजर पास में रखे शिलाखंड पर पड़ी, ये वहीं अवशेष पत्थर है, जो खुदाई के दौरान जमीन के अन्दर से मिली थी.

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थोड़ी दूर आगे जाने पर दाहिने तरफ एक बोर्ड लिखा था जिसपर लिखा था – भगवान राम का दर्शन करें. करीब पौने घंटे लाइन में रहने के बाद वो जगह दिखी जहां ‘राम लला’ की मूर्ति स्थापित है. एक तिरपाल के अंदर हमारे राम लला विराजमान थे. लगभग 20 फीट की दूरी से हमने अपने आराध्य भगवान राम का दर्शन किया. सामने रामलला को देख मन श्रद्धा से अभिभूत हो गया. वहीं एक पंडित जी बैठे थे, जो अपनी थाली में से मुकुनदाना का प्रसाद दर्शनार्थियों को देते जा रहे थे. प्रसाद पाकर हमलोग भी भारी मन से आगे बढ़े, मन ही मन ये सोचते हुए कि अगली बार जब आयेंगे तो राम लला इस टेंट में नहीं, बल्कि भव्य मंदिर में होंगे.

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राम जन्म भूमि मंदिर से बाहर निकलने के बाद अब हम अमावां राम मंदिर पहुंचे. राम जन्म भूमि परिसर के करीब इस मंदिर का निर्माण पटना महावीर मंदिर ट्रस्ट द्वारा करवाया गया है. अयोध्या में ये पहला मंदिर है, जहां भगवान राम के बाल रूप के दर्शन होते हैं. यहीं पर भक्तों के लिए लंगर की भी सुविधा उपलब्ध है. आपको बता दें कि अयोध्या मामले पर फैसले के बाद पटना के महावीर मंदिर ट्रस्ट की तरफ से बड़ा एलान किया गया था. आचार्य किशोर कुणाल ने ये घोषणा की थी कि अयोध्या में रामलला के दर्शन करने आने वाले सभी श्रद्धालुओं को महावीर मंदिर पटना की तरफ से फ्री में भोजन कराया जाएगा. इस सुविधा का लाभ हमलोगों ने भी उठाया. और स्वादिष्ट दाल – चावल और दो तरह की सब्जी खाने का मजा लिया. हालांकि, अफ़सोस इस बात का रहा कि हमलोगों के मोबाइल – कैमरे सब क्लॉक रूम में थे, जिसके कारण इस मंदिर में हमारी फोटोग्राफी नहीं हो पायी.

यहां से अब हमें अयोध्या शहर के बीच में स्थित भगवान राम के पिता और अयोध्या के राजा दशरथ के महल जाना था. ये हनुमान गढ़ी से सिर्फ 5 सौ मीटर की दूरी पर ही स्थित है. इस मंदिर को बड़ा स्थान या बड़ी जगह के नाम से भी जाना जाता है. कहा जाता है कि महाराज दशरथ अपनी तीन रानियां और पूरे परिवार समेत यहीं रहते थे. इस मंदिर की स्थापत्य कला देखने लायक है. सुंदर कलाकारी और रंगों से सजी मंदिर की दीवारें आपका मन मोह लेगी. ये स्थल श्रद्धालुओं के लिए सुबह 8 बजे से लेकर दोपहर 12 बजे तक और शाम 4 बजे से लेकर रात दस बजे तक खोला जाता है. एक और अच्छी बात ये है कि यहां आपको फोटो लेने पर कोई रोकेगा भी नहीं. तो जिस महल में भगवान विष्णु के अवतार मर्यादा पुरुषोत्तम राम ने जन्म लिया, उस महल के अंदर हमलोगों ने भी खूब सेल्फी ली और वीडियोज बनाए.

राजा दशरथ का महल देखने के बाद अब हम पहुंचे भगवान राम और माता सीता के महल यानि कनक भवन में. इस मंदिर के बारे में कहा जाता है कि जब विवाह के बाद भगवान राम, सीता के साथ अयोध्या पहुंचे थे, तब माता कैकेयी ने सीता जी को ये महल मुंह दिखाई में दिया था. ये महल बिलकुल अपने नाम जैसा है, कनक यानि सोने सा पीला. इस भवन की चौखट और किनारों पर बुन्देलखंडी और राजस्थानी शिल्पकारी की गई है, जो इस महल की खुबसूरती में चार चांद लगाती है. इस महल के बीच में नक्काशीदार दीवारों और झरोखों से घिरा एक आंगन है. अंदर चांदी का मंडप बना है, जिसके बीच में सोने के मुकुट और आभूषण पहने भगवान राम और माता सीता विराजमान हैं. कनक भवन की सुंदरता अपनी नजरों में बसा कर अब हम सरयू घाट की ओर बढ़ चले. अयोध्या सरयू नदी के किनारे बसा है.

कनक मंदिर

अयोध्या के मंदिर घूमते घूमते कब शाम हो गयी पता भी नहीं चला. हमें वापस होटल भी जाना था, तो फिर राम जन्म भूमि चौक पहुंचे. यहां हमें फैजाबाद रकाब गंज चौक के लिए शेयर ऑटो मिल गए, सिर्फ दस रुपए प्रति व्यक्ति भाड़ा देकर हम अपने होटल पहुंच गए. हालांकि इस रात हमलोगों ने रकाब गंज, 162 में ही होटल प्रेम में कमरे की बुकिंग की थी. जो काफी सस्ता और अच्छा लगा. सिर्फ चार सौ रुपए में एक रात के लिए यहां हमें अटैच्ड बाथरूम के साथ डबल बेड रूम मिल गया. ये होटल मेन रोड पर था, और यहां की साफ़ सफाई भी बढ़िया थी. फ्रेश होने के बाद रात में फिर हमलोग  रकाब गंज चौक पहुंचे. यहां हमें एक ढाबा दिखा जहां बाहर  गरमागरम रोटियां सेंकी जा रही थी. बस फिर क्या था, भूख तो लगी ही थी, टूट पड़े खाने पर. राम लला के दर्शन के बाद मन अब पूरी तरह शांत हो चुका था. कल की रात जहां आंखों में नींद नहीं आ रही थी, ये रात कब गुजर गई पता ही नहीं चला. अगली सुबह जब उठे तो खुद में एक अलौकिक शक्ति सा महसूस हो रहा था. हमें पटना भी लौटना था, ऐसे में जल्दी – जल्दी फ्रेश हुए और 9 बजे होटल से चेक आउट कर फ़ैजाबाद स्टेशन निकल पड़े. वापसी में फ़ैजाबाद से पटना के लिए हमारा रिजर्वेशन फरक्का एक्सप्रेस में था.

स्टेशन पर पहुंचते ही हमारी नजर वहां गोयठा पर बन रहे लिट्टी पर पड़ी. जिसे देख हमारी भूख और बढ़ गई. गरमागरम लिट्टी और चोखा हाथ में लेकर अभी खाने वाले ही थे, तभी पता नहीं कहां से एक बन्दर वहां पहुंच गया, और झपटा मार कर हमारे प्लेट से लिट्टी ले भागा, शायद हमसे भी ज्यादा उसे भूख लगी थी. हम तो बस कभी उसे और कभी अपने खाली प्लेट को ही देखते रह गए.

तो इस तरह अयोध्या में हमारी घुमक्कड़ी चली. इस दौरान जितना वक़्त इस शहर में बिताया, उसके अनुसार यही महसूस किया कि 134 साल पुराने अयोध्या मामले पर आए फैसले को लेकर अब यहां लोग और ज्यादा उत्साहित दिख रहे थे. हालांकि शहर की सड़कों और चौक – चौराहों पर सुरक्षा की भी तगड़ी व्यवस्था नजर आई. मंदिरों में भीड़ भी थी और जमकर प्रभु श्री राम के जयकारे भी लग रहे थे. देशभर में भले ही अयोध्या न्यूज़ चैनलों और अख़बारों की लीड खबर बनते रहे हों, पर उन राजनीति और विवाद से दूर ये शहर और यहां के लोग अपनी ही गति में चल रहे. यहां की छोटी – छोटी गलियां, और उसमें लोगों की लगातार आवाजाही, भीड़ में अपनी जगह बनाती साइकिलें, टिन…टिन… करती उसकी घंटी की वो मधुर ध्वनि तो वहीं सरपट भागते बाइक, हर कोई अपने में मग्न दिखा. जो सही मायनों में अयोध्या को एक अनोखा और अद्भुत शहर बना रही थी. हां, इन सबके बीच अगर आप राम जन्म भूमि मंदिर के दर्शन करने आ रहे हैं तो अपना पहचान पत्र अपने साथ जरुर रख लें. सिक्यूरिटी को देखते हुए ये बहुत जरुरी है. क्योंकि सुरक्षाकर्मी आपसे आपकी पहचान और सवाल कुछ भी पूछ सकते हैं. ऐसे में उन्हें सही – सही जानकारी दें, इससे आपको भी परेशानी का सामना नहीं करना पड़ेगा.

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