यूँ तो गुजरात, सिक्किम, उड़ीसा, महाराष्ट्र, उत्तरप्रदेश सहित देश के कई हिस्सों में अपनी उपस्थिति दर्ज करा ली है, पर अपने पड़ोसी राज्य झारखंड की खूबसूरती के दीदार से अभी तक वंचित था. हालांकि धनबाद, रामगढ़ जैसे शहरों में आना जाना हुआ, राउरकेला यात्रा के दौरान भी रांची रेलवे स्टेशन पर कुछ घंटे बिताया पर कभी मुसाफिर बन कर इस राज्य में भटकने का मौका नहीं मिला. झारखंड के बगल में रहने के बावजूद यहां की सुन्दरता देखने से अब तक वंचित था. तभी तो सैर सपाटे के लिए हमेशा तैयार रहने वाला मैं, सोचा क्यों न इस बार चला जाए भारत के 28वें राज्य झारखंड की ओर.

यह राज्य देश के मध्यपूर्व भाग में स्थित छोटानागपुर पठार पर अवस्थित है, जो न केवल शस्य-श्यामला धरती के लिए प्रसिद्ध है, बल्कि अपनी प्राकृतिक एवं खनिज संपदा के लिए भी जानी जाती है.इसलिए 2016 के दिसंबर महीने में हम सभी ने झारखंड भ्रमण का प्लान बनाया. हालांकि अपने ट्रेवल पैकेज में हमने झारखंड के दो जगहों जमशेदपुर और रजरप्पा स्थित माँ छिन्नमस्तिके मंदिर को ही रखा.

पटना से झारखंड के लिए हमारा रिजर्वेशन साउथ बिहार एक्सप्रेस में था. यह ट्रेन राजेंद्रनगर से रात 8:25 बजे खुलती है जो दुर्ग तक जाती है. हमलोगों की सीट एस 11 स्लीपर डिब्बे में थी. ट्रेन अपने तय समय से खुली और हमलोग भी ट्रेन में रात का भोजन कर अपनी अपनी सीट पर सोने के लिए आ गए. मन तो उस झारखंड की सरजमीं पर उतरने के लिए बेताब था जो कभी अपने राज्य बिहार का हिस्सा रह चुका है. अपने बर्थ पर लेटे  लेटे मोबाइल पर झारखंड से जुड़ी जानकारियां पढ़ रहा था और फिर कब नींद के आगोश में चला गया पता भी नहीं चला. अगली सुबह जब आंखें खुली तो ट्रेन की खिड़की से बाहर प्रकृति के अद्भुत सौन्दर्यपर नजर पड़ी.जिसे देखकर अभिभूत हो उठा.

यहां की हरियाली से लेकर पहाड़-पठार, नदी,घाटी मानों हमारा स्वागत कर रही हो. झारखंड पर प्रकृति ने अपने सौंदर्य कोखुलकर लुटाया है, तभी तो यहां हर साल अपनी छुट्टियां बिताने के लिए पर्यटकों की भीड़ जुटती है.झारखंड अपने देश का सबसे नया राज्य है. पहले यह बिहार का ही एक हिस्सा हुआ करता था और झारखंड की राजधानी रांची गर्मी के दिनों में बिहार की ग्रीष्मकालीन राजधानी बन जाती थी.

झारखंड में हमारा ठिकाना जमशेदपुर यानि टाटा था. वही टाटानगर जो जमशेदजीनसरवानजी टाटा की प्रेरणा से बना था और जिसे भारत का पहला सुनियोजित ढ़ंग से बसे शहर होने का तमगा प्राप्त है. लार्ड केम्सफोर्ड ने1919 में जमशेदजी नसरवानजीटाटा के सम्मान में इस शहर का नाम जमशेदपुर रखा था.आपको बता दें कि सिंहभूम जिले के पूर्वी छोर पर और छोटानागपुर पठार पर स्थित जमशेदपुर मेंभारत का पहला स्टील और लौह संयंत्र टाटा स्टील स्थित है जो इस राज्य कागौरव है. वैसे तो यह शहर पूरी तरह इंडस्ट्रियल टाउन है लेकिन यहां कई ऐसे पार्क, अभयारण्य और लेक हैं जो घूमने आने वाले सैलानियों का ध्यान अपनी ओर खींचतेहैं. अपनी यात्रा के दौरान डेल्मा पहाड़ी की गोद में बसा जमशेदपुर मुझे काफी अच्छा लगा. इस शहर के किनारे किनारे बहने वाली स्वर्णरेखा नदी के बारे में कहा जाता है कि इसमें सोना पाया जाता है.

टाटा हमलोग सुबह करीब 8 बजे तक पहुँच गए थे और अपने रिलेटिव डबलू जी के घर रुके थे. रातभर के सफ़र की थकान थी, इसलिए जल्दी जल्दी फ्रेश होकर सभी रिफ्रेश हो गए. इसके बाद हमसभी ने प्लान बनाया जुबली पार्क घुमने का और निकल बने करीब 238 एकड़ में फैले जुबली पार्क की खूबसूरती को निहारने.

जमशेदपुर कोर्ट परिसर के पास स्थित इस पार्क को टाटा स्टील के 50वेंसालगिरह के मौके पर बनाया गया था. साल 1958 में बने इस पार्क में चिल्ड्रेनपार्क और झूला पार्क भी है. रात में रंगबिरंगे पानी के फव्वारे जुबली पार्क कीखूबसूरती में चार चांद लगाते हैं. जब हमलोग यहां पहुंचे तो उस वक़्त टाटा कंपनी द्वारा जमशेदपुर कार्निवाल का आयोजन किया गया था. जिसमें नाच-गाने के साथ साथ पुराने गाड़ियों की प्रदर्शनी लगी थी. अलग अलग राज्यों की झांकियां निकाली जा रही थी.

सबसे अच्छा लगा जब पार्क में आने वाले पर्यटकों का स्वागत आसमान में उड़ते हेलीकाप्टर द्वारा फूलों की बारिश से की गयी. कार्निवाल की खुबसूरत आयोजन के बीच पार्क की सुन्दरता को निहारना मन को सुखद अहसास दे रहा था. हमलोगों ने अपना समय काफी देर यहां बिताया और उन बेहतरीन पलों को अपने कैमरे में कैद किया.

जुबली पार्क से निकल कर अब हमलोग जमशेदपुर शहर से करीब 13 किलोमीटर दूर  डिमना लेक घुमने निकले. दलमा पहाड़ी की तलहटी में बसी इस लेक में बोटिंग का लुत्फ़ उठाने लोग आते हैं. साथ ही ये पूरा इलाका शहर के लोगों का पसंदीदा पिकनिक पॉइंट है, जहां प्राकृतिक सौन्दर्य का दिलकश नजारा देखने को मिला.

यहां घूमते हुए अब शाम होने लगी थी और भूख भी लगने लगी थी तोडिमना बांध के ऊपर ही हमलोगों ने समोसा, कोल्डड्रिंक और स्नेक्स की पार्टी कर ली, हां खाने पीने के दौरान भी हमने यहां खूब मस्ती की और इस बीच सेल्फी और ग्रुप फोटोज लेने का सिलसिला भी चालू रहा.

अगले दिन हमारा कारवां रजरप्पा स्थित मां छिन्नमस्तिके मंदिर की ओर चला. यह शक्तिपीठ माँ काली को समर्पित है.  मंदिर तो यहां का खूबसूरत है ही, साथ ही मुझे यह स्थान भी किसी पिकनिक स्पॉट से कम नहीं लगा. इसकी चर्चा अगले पोस्ट हमारी झारखंड यात्रा भाग-2 मां छिन्नमस्तिके मंदिर के दर्शन में करूंगा.

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